प्रवीण दुबे
कमलनाथजी थोड़ा आहिस्ता ,थोड़ा सम्भलकर ज्यादा तेज चलने से दुर्घटना का डर रहता है।वैसे भी आपको यह नहीं भूलना चाहिए जिस रथ पर आप सवार होकर इतनी तेज सवारी कर रहे हैं उसके पहियों को सही सलामत रखने आपको उसमें पेमन्द लगाना पड़ा है। साफ है जनता ने भले ही आपके प्रतिद्वंद्वी को सत्ताच्युत किया है लेकिन सत्तारूपी रथ पर आपको भी स्वतंत्र रूप से नहीं बैठाया है। आपको भी बहुमत से दूर ही रखा है,लेकिन आपकी तेज चाल ऐसा अहसास कराती दिखाई दे रही है जैसे कि आप इस सच्चाई को भूल गए हैं।
हो सकता है यह आपकी मजबूरी रही हो ऐसा इसलिए क्यों कि आप जिस राजनीतिक दल के सिपाही हैं उसके सरदार का एक ही लक्ष्य है येन केन प्रकारेण मोदी को सत्ता से हटाकर खुद कैसे काबिज हुआ जाए इसके लिए जरूरी होगा कि आप जल्द से जल्द ऐसा कुछ करते रहें जिससे आपके सरदार को मोदी और उनके दल के खिलाफ मसाला मिलता रहे और इसका इस्तेमाल लोकसभा चुनाव में किया जा सके।
राजनीति में यह जायज हो सकता है लेकिन ऐसा करने से पहले यह नहीं भूलना चाहिए कि जिसके खुद के घर सीसे के होते हैं वो दूसरों पर पत्थर नहीं उछालते । क्या यह सच नहीं है कि पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने तमाम ऐसे कल्याणकारी ओर जनहित के कार्य किये जिसके कारण वे आज भी मध्यप्रदेश के सबसे प्रभावी और जनता के चहेते नेताओं की कतार में सबसे आगे बने हुए हैं,क्या यह भी सच नहीं है कि शिवराज के नेतृत्व में हाल ही में सम्पन्न हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा को कांग्रेस से ज्यादा वोट मिले हैं। क्या यह सच नहीं हैं कि चुनाव परिणाम आने के बाद से लेकर मन्त्रीमण्डल के गठन और फिर विभागों के बंटवारे तक आप बेबस और अपनी दमपर पर निर्णय न ले पाने वाले मुख्यमंत्री साबित हुए हैं। क्या यह भी सच नहीं कि जनता के बीच खराब छवि के कारण राहुल ने विधानसभा चुनाव के दौरान प्रदेश के जिस बड़े नेता को सक्रिय चुनाव प्रचार से दूर रहने को कहा था ,सरकार बनने के बाद वही नेता परदे के पीछे से आपकी सरकार चलाते दिखाई दे रहे हैं।
यदि यह सब कुछ सही है तो समझदारी इसी में ही है कि आप थोड़ा धीरे और सोच समझकर चलें। निःसंदेह यह सच है कि प्रदेश की जनता ने बदलाव का जनादेश दिया है,इसी के चलते आप प्रदेश के मुख्यमंत्री बने हैं। आपके पीछे कांग्रेस के सर्वेसर्वा राहुल गांधी का भी पूरा समर्थन है। साफ है फिलहाल आपको चुनौती देने वाला कोई नहीं है। फिर जल्दी किस बात की ,जहां तक आपके व्यक्तिगत राजनीतिक जीवन और स्वभाव की बात है , लम्बे राजनीतिक जीवन में आपकी छवि एक ईमानदार, मिलनसार ,अनुभवी और अच्छे राजनीतिक प्रबन्धक की रही है , कौन भूल सकता है उस भावुक कर देने वाले घटनाक्रम को जब शपथग्रहण समारोह में आपने शिष्टाचार और सौहार्दता की पराकाष्ठा को प्रस्तुत करते हुए सत्ताच्युत हुए शिवराज को अपने मंच पर बुलाकर उनके साथ हाथ उठाकर जनता का अभिवादन किया था।
निःसन्देह यह घटनाक्रम बहुत कुछ सन्देश देता है।इसमें सन्देश छुपा है सबको साथ ले राजनीतिक दुर्भावना को परे रखकर प्रदेश को आगे ले जाने का, पर इसके बावजूद सरकार बनाने के कुछ घण्टों में ही जो कुछ निर्णय लिए गए और लगातार लिए जा रहे हैं उसे देखकर ऐसा लगता है कि बहुत कुछ राजनीतिक दुर्भावना के वशीभूत होकर किया जा रहा है। खासकर प्रदेश की उच्च नोकरशाही को लेकर उच्च शिक्षा संस्थानों को लेकर, सामाजिक व गैर राजनीतिक संगठनों को लेकर साथ ही कुछ चर्चित सरकारी विभागों को लेकर आपकी सरकार जो कुछ कर रही है उसने प्रदेश में भय का वातावरण निर्मित कर दिया है।
जो स्वस्थ्य लोकतंत्र के लिए कतई ठीक नहीं कहा जा सकता। इसके लिए सीधे आप जिम्मेदार हैं ऐसा लगता तो नहीं पर कौन इतनी जल्दबाजी में है यह विचारणीय जरूर है।
पिछली सरकार ने जो कुछ किया हो सकता है उसमें कुछ कमियां रही हों उन्हें सुधारने में भी कोई बुराई नहीं है । लेकिन इसमें नोकरशाहों को निशाने पर लेना ,सार्वजनिक रूप से संचालित शिक्षा संस्थानों को टार्गेट करना वो भी सत्ता परिवर्तन के चंद घण्टों बाद ही बिना किसी जांच के कहां तक उचित है। नहीं भूलना चाहिए कि बड़े पैमाने पर कलेक्टर आदि उच्च प्रशासनिक फ़ेरबदल से प्रदेश का सरकारी कामकाज बुरी तरह प्रभावित होता है और इसका सीधा असर जनता पर पड़ता है। हालात कितने गम्भीर होंगे इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इतनी बड़ी प्रशासनिक सर्जरी के दुष्परिणाम रोकने के लिए चुनाव आयोग को इसपर रोक की बात कहना पड़ी। उल्लेखनीय है कि विधानसभा चुनाव के कारण लागू आदर्श आचार संहिता के कारण लम्बे समय से सरकारी कामकाज पहले ही प्रभावित रहा है,आने वाले दो महीने के बाद पुनः आचार संहिता लागू होने वाली है अतः प्रशासनिक अस्थिरता पैदा करना कहां तक नीतिसंगत ठहराया जा सकता है।
रही बात राजनीतिक व वैचारिक मतभेद के कारण व्यक्तिओं संगठनों पर कार्यवाही की बात तो कमलनाथ जी थोड़ा दिल बड़ा करके विचार कीजिए जिस संगठन और उससे जुड़े लोगों को आपकी सरकार टार्गेट कर रही है उसपर रोक लगाने की बात सामने आ रही है क्या वह सही है । ऐसा करने से पहले आप उस कांग्रेस व उसके सबसे बड़े नेता रहे जवाहर लाल नेहरू के बारे में भी पढ़ लें जिन्होंने प्रधानमंत्री रहते 26 जनवरी की परेड में मार्चपास्ट के लिए उसी संगठन को आमंत्रित किया था,इतना ही नहीं लालबहादुर शास्त्री ने प्रधानमंत्री रहते पाकिस्तान युद्ध के समय उसी संगठन को देश की यातायात व्यवस्था सम्भालने का आग्रह किया था। आपके आदर्श पुरुष महात्मा गांधी उसी संगठन के शिविर में गए थे और उसकी समरसता और सेवा के भाव की सार्वजनिक प्रशंसा की थी,संविधान निर्माता बाबा साहेब अंबेडकर ने उसी संगठन को नजदीक से देख उसके कार्यों को सराहा था।,देश के राष्ट्रपति पद पर रहते प्रसिद्ध वैज्ञानिक ए पी जे अब्दुल कलाम और प्रणव मुखर्जी ने उसी संगठन के सार्वजनिक मंच पर जाकर उसके कार्यों को सराहा था। सवाल यह है यह क्या यह सब लोग गलत थे ?
कमलनाथ जी हमारा मकसद आपकी निंदा करना कतई नहीं है ना ही हम आपकी नॉलेज या योग्यता अथवा कार्यव्यहार पर अंगुली उठा रहे हैं हम तो केवल इतना कहना चाहते हैं मुख्यमंत्री पद की शपथ आपने ली है तो सरकार के निर्णय भी आप ही कीजिए आप इसमें पूर्ण सक्षम भी हैं आपके निर्णय कोई और ले यह प्रदेश की जनता को बर्दाश्त नहीं होगा। अतः सोच समझकर आराम से थोड़ा धीरे धीरे।