आखिर समीक्षा ने भाजपा के लिए चुनौती प्रस्तुत कर ही दी, जिस चेहरे को पार्टी ने पार्षद से लेकर महापौर तक बनाया संगठन में प्रदेश स्तर का ओहदा दिया वो बागी क्यों बन गया ? इससे भी बड़ा सवाल यह कि पार्टी शीर्ष नेतृत्व इस डैमेज़ को कंट्रोल करने में नाकाम क्यों रहा ? इस नाकामी के लिए दोषी कौन है ?
समीक्षा के मैदान में डटे रहने से दक्षिण विधानसभा के परिदृश्य को बदलकर रख दिया है। 14 नवम्बर के पूर्व जो राजनीतिक पण्डित यह मानकर चल रहे थे कि कांग्रेस द्वारा हल्का प्रत्याशी उतारने से मुकाबला भाजपा के पक्ष में एकतरफा है,वही राजनीतिक विश्लेषक अब यह मान रहे हैं कि इस विधानसभा में मुकाबला नारायण बनाम समीक्षा हो सकता है। कांग्रेस मैदान में कहीं नजर नहीं आएगी। ऐसा दो कारणों से कहा जा रहा है।
पहला कारण कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पूर्वमंत्री भगवान सिंह को टिकिट न दिए जाने से उनका नाराज होना,इस विधानसभा से एक और दावेदार रश्मि पवार सहित कई अन्य जनाधार वाले नेताओं की भी सक्रीयता दिखाई नहीं दे रही।
समीक्षा के कांग्रेस की तुलना में भाजपा के सामने ज्यादा बड़ी चुनौती प्रस्तुत करने का दूसरा बड़ा कारण यह है कि समीक्षा खुद और उनके परिवार को भाजपा की ओर से चुनाव लड़ने का लम्बा अनुभव रहा है। वे खुद तो दो बार पार्षद व एकबार महापौर का चुनाव जीत चुकीं हैं। उनके ससुर नरेश गुप्ता भी पार्टी के बहुत पुराने नेता रहे हैं। वे पांच बार पार्षद रहे, पार्टी के कोषाध्यक्ष की भूमिका भी निभा चुके हैं।
इतना ही नहीं समीक्षा में और भी बहुत सी खूबियां ऐसी है जो आजकल की राजनीति में उन्हें चुनाव में कड़ी चुनौती प्रस्तुत करने के लिए फिट बनाती हैं।कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि समीक्षा के मैदान में डटे रहने से भाजपा की परेशानी बढ़ गई है।