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आछे दिन पाछे गए, हरि से किया न हेत। अब पछताए होत क्या, जब चिड़िया चुग गयी खेत

  आछे दिन पाछे गए, हरि से किया न हेत ।
अब पछताए होत क्या, जब चिड़िया चुग गयी खेत ॥

राजनीति में बहुत सारी बातें मंच से नहीं कही जाती लेकिन जब यह बातें मंच से बाहर आ जाती हैं तो पूरी पार्टी को उसके परिणाम भुगतने पड़ते हैं। अफ़सोस की बात है बीते दिनों मुरैना में ऐसी ही एक बात भाजपा के मंच से बाहर आई और अब देशभर के मीडिया में उसके तमाम निहितार्थ निकाले जा रहे हैं।

कुल मिलाकर पार्टी के नीति निर्धारकों के लिए यह एपिसोड समस्या बन गया है।

आइये उस बयान पर नजर डालें जो सार्वजनिक मंच से दिया गया और अब पूरे देश में चर्चा का विषय बना हुआ है। मध्यप्रदेश भाजपा के बड़े छत्रप विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर ने एक सभा को संबोधितक करते हुए कहा कि गांवों में सड़क, बिजली और नल-जल जैसी योजनाएं पहुंच रही हैं, लेकिन ये मेरे या मुरैना सांसद के कारण नहीं हुआ है। ये सब भाजपा सरकार की योजनाओं और नीतियों का परिणाम है। अपने भाषण में उन्होंने किसी का नाम लिए बिना तंज कसते हुए कहा कि कुछ नेता कहते हैं कि मैं लाया, मैं लाया… लेकिन उन्हें “मैं मैं” से फुर्सत ही नहीं मिलती।

इस बयान में यहां तक तो सब ठीक था क़ि गांवों में सड़क, बिजली और नल-जल जैसी योजनाएं पहुंच रही हैं, लेकिन ये मेरे या मुरैना सांसद के कारण नहीं हुआ है। ये सब भाजपा सरकार की योजनाओं और नीतियों का परिणाम है।

लेकिन गड़बड़ तब हुई जब श्री तोमर ने अपने भाषण में तंज कसते हुए कहा कि कुछ नेता कहते हैं कि मैं लाया, मैं लाया… लेकिन उन्हें मैं मैं से फुर्सत ही नहीं मिलती।

हालांकि श्री तोमर के बयान के तमाम निहितार्थ लगा रहे लोगों को यह भी समझना होगा कि आखिर श्री तोमर को सार्वजनिक मंच से यह बयान देने की स्थिति क्यों निर्मित हुई ? साथ ही मैं मैं की बात करने वालों को पार्टी के नीति निर्धारकों ने समय रहते क्यों नहीं रोका ?

कमोबेश अब मध्यप्रदेश में भाजपा उस दिशा की ओर बढ़ती दिखाई दे रही है जो हालात 90 के दशक में कांग्रेस के भीतर थे वहां सिंधिया गुट, दिग्विजय सिंह गुट, राहुल भैया गुट सहित तमाम धड़ों में कांग्रेस बटी दिखाई देती थी।

इसके दुष्परिणाम सभी को मालूम हैं कांग्रेस न केवल सत्ता से बाहर हुई बल्कि उसका जमीनी नेटवर्क साफ हो गया आज केवल बिना ताज के चंद नेता ही बचे हैं।

आज भाजपा में दो बड़े और दमदार नेताओं के बीच गुटबाजी साफ दिखाई दे रही है ऐसा नहीं कि यह सब कुछ आज कल में हो गया 2020 के बाद इसके बीज पड़े और आज यह वृक्ष बनकर लहलहा रही है।
ग्वालियर चंबल अंचल पूरी तरह इसकी चपेट में आ चुका है। पार्टी के प्रति वैचारिक समर्थन का मनोभाव रखने वाले लाखों लोग इस गुटबाजी और सार्वजनिक मंचों तक जा पहुंची बयानबाजियों से बेहद चिंतित हैं ।
अफसोसजनक बात तो यह है कि न तो पार्टी की अनुशासन समिति ही सक्रीय दिखती है और न ही हाईकमान। यदि समय रहते इसपर लगाम नहीं लगाई गई तो
 

आछे दिन पाछे गए, हरि से किया न हेत ।
अब पछताए होत क्या, चिड़िया चुग गयी खेत ॥

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