Homeप्रमुख खबरेंदेश में कानपुर से सामने आई इच्छा मृत्यु की पहली वसीयत

देश में कानपुर से सामने आई इच्छा मृत्यु की पहली वसीयत


क्यों लिया ये फैसला?
शरद के परिवार में पत्नी और दो बच्चों के अलावा बुजुर्ग माता-पिता हैं। फिर भी उन्होंने अपने जूनियर को यह कानूनी अधिकार दिया। इस सवाल पर शरद ने कहा कि परिवार के लोग संकट और मोह की स्थिति में सटीक फैसला लेने में असमर्थ हो जाते हैं। ऐसे में कोई समझदार इंसान ही निर्णायक फैसला ले सकता है।
10 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने इच्छामृत्यु पर एक अहम फैसला सुनाया। कहा कि कोमा में जा चुके या मौत की कगार पर पहुंच चुके लोगों के लिए Passive Euthanasia (निष्क्रिय इच्छामृत्यु) और इच्छामृत्यु के लिए लिखी गई वसीयत (Living Will) कानूनी रूप से मान्य होगी। इस संबंध में कोर्ट ने डिटेल गाइडलाइन जारी की है।
व्यक्ति अपनी वसीयत में लिख सकता है कि लाइलाज बीमारी होने पर उसे जीवन रक्षक उपकरणों पर न रखा जाए। मृत्यु दे दी जाए।
विल दो गवाहों की मौजूदगी में बनेगा। इसे फर्स्टक्लास ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट प्रमाणित करेगा। इसकी 4 कॉपी बनेंगी। एक परिवार के पास और बाकी ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट, डिस्ट्रिक्ट जज और नगर निगम या नगर परिषद या नगर पंचायत या ग्राम पंचायत के पास रहेगी।
बीमारी लाइलाज होने पर इच्छामृत्यु दी जा सकेगी पर परिवार की मंजूरी जरूरी होगी। परिजनों को अपने राज्य के हाईकोर्ट में इच्छामृत्यु की अर्जी लगानी होगी। कोर्ट मेडिकल बोर्ड गठित करेगा। उसकी अनुमति मिलने पर कोर्ट लाइफ सपोर्टसिस्टम हटाने का आदेश देगा।
जिनके पास लिविंग विल नहीं है और उनके ठीक होने की संभावना नहीं है, तो उनके परिजन इच्छामृत्यु के लिए लिख सकते हैं। मरीज के परिजनों को राज्य के हाईकोर्ट में इच्छामृत्यु के लिए आवेदन करना होगा। बाकी प्रक्रिया वही होगी जो लिविंग विल वाले लोगों के लिए होगी।
इच्छामृत्यु के दुरुपयोग रोकने के लिए कोर्ट ने शर्तें भी रखी हैं। किसी ऐसे व्यक्ति की लाइफ विल को लेकर पूरी छानबीन होगी, जिसे संपत्ति या विरासत में लाभ होने वाला हो। यह जांच राज्य सरकार स्थानीय प्रशासन द्वारा कराएगी।

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