पुणे 3दिसम्बर 2025/भारतीय खगोलविदों ने आकाशगंगा जैसी ही एक ‘सर्पिल’ आकाशगंगा की खोज की है, जो ब्रह्मांड के शुरुआती काल से अस्तित्व में रही है. इस नई खोज ने आकाशगंगाओं के विकसित होने के बारे में मौजूदा समझ को बदल दिया है.
यह शोध नासा के जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप का उपयोग करके किया गया था और इसका नेतृत्व पीएचडी छात्रा राशि जैन ने किया था.
इस शोध का मार्गदर्शन पुणे स्थित टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ़ फ़ंडामेंटल रिसर्च के राष्ट्रीय रेडियो खगोल भौतिकी केंद्र के प्रो. योगेश वाडदेकर ने किया था. यह शोध प्रमुख यूरोपीय खगोल विज्ञान पत्रिका एस्ट्रोनॉमी एंड एस्ट्रोफिजिक्स में छपा है.
आकाशगंगाएँ तारों, ग्रहों, गैस और धूल से बनी विशाल प्रणालियाँ हैं जो गुरुत्वाकर्षण से एक साथ जुड़ी रहती हैं. इनकी संख्या कुछ हज़ार तारों से लेकर खरबों तक होती है, और ये सर्पिल, अण्डाकार या अनियमित आकार में पाई जाती हैं.
शोधकर्ताओं ने इस आकाशगंगा के लिए हिमालयी नदी अलकनंदा का नाम चुना जो गंगा की दो मुख्य धाराओं में से एक है
यह एक सर्पिल आकाशगंगा है जो 12 अरब प्रकाश वर्ष दूर स्थित है. इसका अर्थ है कि आकाशगंगा की रोशनी हम तक पहुँचने के लिए 12 अरब वर्षों से भी अधिक समय तक यात्रा करती है.
इसी बात को समझाते हुए राशि जैन कहती हैं, “हम इस आकाशगंगा को उसी रूप में देख रहे हैं जैसी यह बिग बैंग के ठीक 1.5 अरब वर्ष बाद दिखाई दी थी. इस प्रारंभिक युग में इतनी सुगठित सर्पिल आकाशगंगा का मिलना अप्रत्याशित है. यह हमें बताता है कि हमारे ब्रह्मांड में जटिल संरचनाएँ हमारे अनुमान से कहीं पहले ही निर्मित हो रही थीं.”