एक तरफ इथेनॉल, दूसरी तरफ शक्कर—देशवासियों को आया चक्कर, हाईपर टेंशन में मोदी सरकार
दो दिन पहले शब्द शक्ति न्यूज़ ने उठाया था सवाल, अब राष्ट्रीय मीडिया में भी इथेनॉल और बढ़ती चीनी कीमतों के बीच संबंध पर चर्चा
नई दिल्ली/ग्वालियर। देश में चीनी की कीमतों में आई अप्रत्याशित तेजी और इसके पीछे इथेनॉल नीति तथा गन्ने के इस्तेमाल को लेकर उठ रहे सवालों ने अब राष्ट्रीय स्तर पर तूल पकड़ लिया है। खास बात यह है कि शब्द शक्ति न्यूज़ ने दो दिन पहले ही अपनी खबर में इसी मुद्दे को प्रमुखता से उठाते हुए सवाल किया था कि एक तरफ सरकार इथेनॉल उत्पादन को बढ़ावा दे रही है और दूसरी तरफ चीनी के दाम आम आदमी की रसोई का बजट बिगाड़ रहे हैं।
अब देश के प्रमुख मीडिया संस्थानों में प्रकाशित खबरों में भी चीनी की बढ़ती कीमत, इथेनॉल के लिए गन्ने के इस्तेमाल, घरेलू उपलब्धता और सरकार के सामने पैदा हुई चुनौती को प्रमुखता से उठाया जा रहा है।
शब्द शक्ति न्यूज़ ने पहले ही उठाया था सवाल

शब्द शक्ति न्यूज़ ने अपनी खबर में शीर्षक दिया था—
“एक तरफ इथेनॉल दूसरी तरफ शक्कर, देशवासियों को आया चक्कर, हाईपर टेंशन में मोदी सरकार”।
उस खबर में यह सवाल उठाया गया था कि यदि गन्ने और उससे जुड़े उत्पादों का एक बड़ा हिस्सा इथेनॉल उत्पादन की ओर जाता है तो घरेलू बाजार में चीनी की उपलब्धता पर इसका क्या असर पड़ेगा और अंततः इसकी कीमत का बोझ किस पर पड़ेगा।
अब यही मुद्दा राष्ट्रीय मीडिया की सुर्खियों में दिखाई दे रहा है।
चीनी के दाम में तेज उछाल
हाल के दिनों में चीनी की कीमतों में तेजी ने उपभोक्ताओं की चिंता बढ़ा दी है। हिन्दुस्तान की रिपोर्ट के मुताबिक फतेहपुर में महज 20 दिनों में चीनी का भाव 45 रुपये से बढ़कर 65 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गया। कुशीनगर में भी चीनी का भाव एक पखवाड़े में 42 रुपये से बढ़कर 65 रुपये प्रति किलो बताया गया है।
चीनी की कीमतों में तेजी के पीछे कम उत्पादन, कमजोर बारिश, त्योहारी मांग और बाजार में उपलब्धता से जुड़े कई कारण बताए जा रहे हैं। हालांकि, इथेनॉल के लिए गन्ने के डायवर्जन को लेकर भी अब गंभीर बहस शुरू हो गई है।
सरकार को लेना पड़ा बड़ा फैसला
बढ़ती कीमतों पर नियंत्रण के लिए केंद्र सरकार ने 20 अगस्त को 10 लाख मीट्रिक टन कच्ची चीनी के शुल्क-मुक्त आयात की अनुमति दे दी। यह फैसला करीब एक दशक बाद भारत द्वारा चीनी आयात की दिशा में उठाया गया बड़ा कदम माना जा रहा है। सरकार का उद्देश्य घरेलू बाजार में आपूर्ति बढ़ाकर कीमतों पर नियंत्रण करना है।
इसके साथ ही सरकार ने थोक चीनी उपभोक्ताओं के लिए स्टॉक रखने की सीमा भी 30 दिन से घटाकर 15 दिन कर दी है, ताकि बाजार में कृत्रिम कमी और जमाखोरी पर नियंत्रण रखा जा सके।
इथेनॉल नीति पर भी उठने लगे सवाल
चीनी की कीमतों में तेजी के बीच अब यह सवाल भी जोर पकड़ रहा है कि क्या गन्ने के एक हिस्से को इथेनॉल उत्पादन की ओर मोड़ने से घरेलू चीनी उपलब्धता पर दबाव बढ़ा है?
11 अगस्त को हिन्दुस्तान ने भी रिपोर्ट किया था कि रिकॉर्ड चीनी कीमतों के मद्देनजर सरकार गन्ने से इथेनॉल बनाने पर अंकुश लगाने पर विचार कर रही है। रिपोर्ट के अनुसार ऐसा करने पर घरेलू बाजार में लगभग 30 लाख मीट्रिक टन अतिरिक्त चीनी उपलब्ध हो सकती है।
वहीं हालिया मीडिया रिपोर्टों में चीनी की बढ़ती कीमतों के कारण चीनी मिलों द्वारा इथेनॉल की तुलना में चीनी उत्पादन को अधिक लाभकारी मानने की बात भी सामने आई है।
सवाल वही, जो शब्द शक्ति न्यूज़ ने दो दिन पहले पूछा था
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि देश की ऊर्जा जरूरतों के लिए इथेनॉल जरूरी है या खाद्य महंगाई को नियंत्रित करने के लिए चीनी की पर्याप्त उपलब्धता?
सरकार के सामने चुनौती दोहरी है। एक ओर पेट्रोल में इथेनॉल मिश्रण बढ़ाकर कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता और विदेशी मुद्रा खर्च कम करने की नीति है, तो दूसरी ओर चीनी की कीमतों में तेजी से आम उपभोक्ता प्रभावित हो रहा है।
यही वह विरोधाभास है जिसे शब्द शक्ति न्यूज़ ने अपनी खबर के माध्यम से दो दिन पहले ही पाठकों के सामने रखा था।
अब राष्ट्रीय मीडिया ने भी उठाई वही चिंता
20 अगस्त को प्रकाशित विभिन्न राष्ट्रीय मीडिया रिपोर्टों में “इथेनॉल बनाम चीनी”, “गन्ने का इथेनॉल की ओर डायवर्जन”, “चीनी की रिकॉर्ड कीमतें” और “सरकार की संभावित नीति में बदलाव” जैसे मुद्दे प्रमुखता से सामने आए।
ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि शब्द शक्ति न्यूज़ ने जिस संभावित संकट की ओर दो दिन पहले ध्यान खींचा था, वह अब राष्ट्रीय स्तर की खबर और नीति-निर्माताओं की चिंता का विषय बन चुका है।
शब्द शक्ति न्यूज़—यहां हर खबर बोलती है।