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सबसे बड़ा आतंकी पाकिस्तान : नौ सौ चूहे खाये बिल्ली हज को चली

 प्रवीण दुबे

दुनिया की राजनीति में अक्सर ऐसे देश सामने आते हैं जो अपने वास्तविक चरित्र को छुपाकर वैश्विक मंच पर खुद को शांति दूत के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश करते हैं। पाकिस्तान इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। आज जब खाड़ी क्षेत्र में तनाव और युद्ध जैसे हालात बने हुए हैं, तब पाकिस्तान खुद को “शांति का चौधरी” साबित करने की कोशिश कर रहा है। लेकिन सवाल यह है कि क्या जिस देश का इतिहास आतंकवाद को पनाह देने का रहा हो, वह वास्तव में शांति का पैरोकार हो सकता है?
आतंकवाद की जड़ में पाकिस्तान की भूमिका
भारत के लिए पाकिस्तान का आतंकी चेहरा कोई नई बात नहीं है। 26/11 Mumbai attacks जैसे भीषण हमलों ने पूरी दुनिया को हिला दिया था। इस हमले के मास्टरमाइंड को पाकिस्तान में संरक्षण मिला—यह तथ्य अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी स्वीकार किया गया।
इसी तरह, दुनिया के सबसे बड़े आतंकी हमलों में से एक September 11 attacks (वर्ल्ड ट्रेड सेंटर हमला) ने अमेरिका को झकझोर दिया था। इस हमले का मास्टरमाइंड Osama bin Laden वर्षों तक पाकिस्तान के एबटाबाद में छुपा बैठा रहा। यह घटना अपने आप में पाकिस्तान की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े करती है कि आखिर कैसे दुनिया का सबसे वांछित आतंकी उसकी धरती पर सुरक्षित रहा?
आतंकी संगठनों की शरणस्थली
पाकिस्तान लंबे समय से कई प्रतिबंधित आतंकी संगठनों का सुरक्षित ठिकाना रहा है। Lashkar-e-Taiba और Jaish-e-Mohammed जैसे संगठन भारत में अनेक हमलों के लिए जिम्मेदार रहे हैं। इन संगठनों को न केवल पाकिस्तान की जमीन मिली, बल्कि उन्हें संसाधन और प्रशिक्षण भी वहीं से प्राप्त हुआ।
खुद अमेरिका ने United States Department of State के माध्यम से कई संगठनों को “Foreign Terrorist Organizations (FTO)” की सूची में शामिल किया है। इनमें लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद, अल-कायदा जैसे संगठन शामिल हैं। यह सूची इस बात का प्रमाण है कि वैश्विक स्तर पर भी पाकिस्तान से जुड़े आतंकी नेटवर्क को मान्यता मिली हुई है।
अमेरिका की दोहरी नीति
अमेरिका की नीति इस पूरे मामले में सबसे अधिक सवालों के घेरे में है। एक तरफ वह आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक अभियान का नेतृत्व करता है, वहीं दूसरी तरफ पाकिस्तान जैसे देश के साथ रणनीतिक साझेदारी बनाए रखता है। September 11 attacks के बाद भी यदि पाकिस्तान जैसे देश पर पूरी तरह कठोर कार्रवाई नहीं होती, तो यह वैश्विक नीति की विफलता ही मानी जाएगी।
भारत के खिलाफ प्रॉक्सी वार
पाकिस्तान ने सीधे युद्ध के बजाय “प्रॉक्सी वार” यानी परोक्ष युद्ध की नीति अपनाई है। सीमा पार से आतंकियों को भेजना, उन्हें हथियार और प्रशिक्षण देना, और भारत में अस्थिरता फैलाने की कोशिश करना—यह सब उसकी रणनीति का हिस्सा रहा है। Lashkar-e-Taiba और Jaish-e-Mohammed जैसे संगठनों के जरिए भारत में लगातार हमले कराए जाते रहे हैं।
शांति का ढोंग क्यों?
खाड़ी संकट में मध्यस्थ बनने की पाकिस्तान की कोशिशें दरअसल उसकी छवि सुधारने की रणनीति हैं। अंतरराष्ट्रीय मंच पर खुद को जिम्मेदार राष्ट्र दिखाने के लिए वह शांति की बातें करता है, लेकिन उसकी जमीन पर पल रहे आतंकी नेटवर्क उसकी सच्चाई उजागर कर देते हैं।

पाकिस्तान का इतिहास और वर्तमान—दोनों ही यह साबित करते हैं कि वह आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में विश्वसनीय भागीदार नहीं हो सकता। Osama bin Laden का पाकिस्तान में छिपा होना और 26/11 Mumbai attacks जैसे हमलों में उसकी भूमिका इस सच्चाई को और मजबूत करते हैं।
जब तक पाकिस्तान अपनी धरती से आतंकवाद की जड़ों को खत्म नहीं करता, तब तक उसका “शांति दूत” बनने का दावा केवल एक दिखावा ही रहेगा। दुनिया को अब यह तय करना होगा कि वह आतंक के साथ समझौता करेगी या वास्तविक शांति के पक्ष में खड़ी होगी।

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