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आज भी जीवित हैँ लोकतंत्र की हत्यारी मानसिकता के अनुगामी,नई पीढ़ी को सच्चाई जानना जरूरी

प्रवीण दुबे

 

आज भी जीवित हैँ लोकतंत्र की हत्यारी मानसिकता के अनुगामी,नई पीढ़ी को सच्चाई जानना जरूरी

आपातकाल अर्थात भारतीय लोकतंत्र का वह बदनुमा दाग जिसने पूरी दुनिया में भारत को शर्मसार करके रख दिया था। इस काले अध्याय को रचने वाली महिला का नाम था पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी इसे देश का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा की प्रधानमंत्री पद को अपनी तानाशाही प्रवृत्ति का हथियार बनाकर

देशवासियों पर अत्याचार करने वाली उपरोक्त महिला इस जघन्य कृत्य को अंजाम देने के बाद भी कुछ वर्ष पश्चात पुनः प्रधानमंत्री बनी बल्कि वह राजनीतिक दल आज भी जीवंत बना हुआ है। आज आपातकाल की बरषी है,46 वर्ष के इस लंबे अंतराल में बहुत कम ऐसे लोग बचे हैं जिन्होंने इस तानाशाही को भोगा , या उसको अपनी आंखों से देखा। आपातकाल के बाद

जन्म लेने वाली पीढ़ी भी अब प्रोढ़ हो चुकी है इस प्रोढ़ हो चुकी पीढ़ी के बेटे बेटियां भी अब जवान हो चुकें हैं इन्हें नहीं मालूम 25 जून 1975 की हिटलरशाही मानसिकता से उपजे उस काले अध्याय की कहानी ।1975 को इस दिन देश का सबसे काला दिन माना जाता है। इसी दिन पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल की घोषणा की थी। देश में 21 महीने तक इमरजेंसी लगी थी जिसके तहत समस्त नागरिक अधिकारों को सस्पेंड कर दिया गया। प्रेस पर सेंसरशिप लागू हो गई अखबारों में वही छपता जो सरकार चाहती थी। रही बात रेडियो कि तो वो पहले से ही सरकार के अधिकार क्षेत्र में था आज वह दिन है जब इन्हें इस बारे में बताया जाए,इन्हें समझाया जाए की आज भी उस विचारधारा को अंगीगार कर राजनीति करने वाला दल देश में जीवित है। यह भी समझाने की जरूरत है की देश में पुनः वह स्थिति पैदा न हो इसके लिए वर्तमान में जो भी कदम उठाया जाए  पहले इतिहास को जरूर पढ़ और समझ लिया जाए। ध्यान रखना होगा की जो लोग आज तानाशाही, लोकतंत्र की हत्या, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, मानव अधिकारों के उल्लंघन, विपक्ष की अनदेखी,असहिष्णुता जैसे राग जोर जोर से अलापते दिखाई देते हैं उनका असली इतिहास क्या था ? उनके इन सारे जुमलों का उत्तर एकमात्र आपातकाल के काले अध्याय में छुपा हुआ है।

इसके साथ ही आज का दिन उन लोगों के संघर्ष को याद करने का भी है जिन्होंने लोकतंत्र की रक्षा के लिए लाठियां खाईं, जेल में यातनाएं सहीं लेकिन न झुके न डरे ।

राजमाता विजयाराजे सिंधिया,अटलबिहारी वाजपेयी, माधव शंकर इंदापुरकर, शीतला सहाय,प्रोफेसर कप्तान सिंह सोलंकी, नारायण कृष्ण शेजवलकर,अण्णा जी ,चिकटेजी, दादा बेलापुरकर,मोघेजी, मानिकचन्द वाजपेयी ,  बाबा खानवलकर ,दादा बैजनाथ जी,मोतीलाल शर्मा,डॉ शिव बरुआ, ,नरेश जौहरी, मोहन विटवेकर, मदन बाथम जैसे न जाने कितने लोगों ने अपना घर परिवार छोड़कर उस अत्याचार का प्रतिकार किया। इनमें अनेक स्वर्गवासी हो गए तमाम

अभी जीवित हैं। सच पूछा जाए तो ऐसे लोग जिन्होंने आपातकाल की विभीषिका को भोगा है और अभी हमारे बीच जीवित हैं वे जीता जागता प्रत्यक्ष प्रमाण हैं उस काले अध्याय का। आपातकाल की बरषी पर हम सब मिलकर इनका सम्मान करें साथ ही उनके श्रीमुख से लोकतंत्र की हत्या के जघन्य कृत्य की आपबीती को सुने साथ ही यह संकल्प लें की उस तरह की मानसिकता के अनुगामियों को कभी पनपने नहीं देंगे।

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