प्रवीण दुबे
ग्वालियर /पूरे देश की तरह अटलजी के गृहनगर ग्वालियर में भी आज उनके जन्मदिन पर उन्हें याद किया जा रहा है। लेकिन इस अवसर पर अटलजी की वे दो इच्छाएं भी याद आ रही हैं जिन्हें ग्वालियर वासी आजतक पूरा नहीं कर सके हैं। आज यह भी सवाल उठता है की आखिर इसके लिए कौन दोषी है ?
आप सोच रहे होंगे आखिर अटलजी की ग्वालियर से जुड़ी वो कौन सी दो इच्छाएं हैं जो आजतक पूरी नहीं हो सकी हैं। तो उनके जन्मदिनांक को हम आपको बताएंगे अटलजी की उन दो इच्छाओं के बारे में । चूंकि यह दोनों इच्छाएं ऐसे संगठनों से जुड़ी हैं जिनका कहीं न कहीं अटलजी से सम्बंध है बावजूद इसके इनको पूरा करने की जिमेदारी को इन संगठनों ने कभी भी गम्भीरता से नहीं लिया परिणामस्वरूप यह आज भी अधूरी की अधूरी हैं।
अटलजी की इन दो इच्छाओं में से पहली थी ग्वालियर में हिंदी भवन की स्थापना किये जाने की और दूसरी इच्छा थी दौलतगंज में फुटपाथ पर बैठकर अटलजी के मनपसंद मंगोड़े बनाने वाली गरीब वृध्द महिला को गुमटी या दुकान आवंटित किए जाने की।
चूंकि अटलजी को जितना लगाव अपने देश की राष्ट्रभाषा हिन्दी से था उतने ही मनपसंद थे दौलतगंज के फुटपाथ पर मंगौड़ेवाली चाची द्वारा चूल्हे पर तले जाने वाले मंगोड़े।
शायद यही वजह थी की अटलजी ने ग्वालियर में भव्य हिंदी भवन की स्थापना और और विपरीत हालातों में फुटपाथ पर बैठकर मंगौड़े तलने वाली बूढ़ी चाची की सहायता स्वरूप उन्हें स्थाई गुमटी दिए जाने की घोषणा व अनुशंसा अटलजी ने सार्वजनिक रूप से की थी।
यहां उन कार्यक्रमों का जिक्र करना भी जरूरी है जहां अटलजी ने ऐसा किया था। बात 2004 की है। प्रधानमंत्री पद से हटने के बाद अटलजी अपना जन्मदिन मनाने तीन दिवसीय प्रवास पर ग्वालियर आए थे। 25 दिसंबर को उनका जन्मदिन था और अगले दिन यानी 26 दिसंबर को उन्होंने मध्यभारत हिंदी साहित्य सभा के शताब्दी वर्ष समारोह में बतौर मुख्य अतिथि शामिल होने की सहमति दी थी। इस कार्यक्रम में जहां उन्होंने अपने छात्र जीवन की साहित्यिक केंद्र रहे दौलतगंज में स्थापित मध्यभारत हिंदी साहित्य सभा के ऐतिहासिक भवन और उसके घुमावदार गोल जीने व अन्य गतिविधियों का अपने विशिष्ट अन्दाज में उल्लेख करते हुए कहा था की मेरी इच्छा है की ग्वालियर में अब विशाल हिंदी भवन की स्थापना हो। अटलजी ने इसके लिए बाद में आर्थिक सहायता के लिए धन व लीज पर सिटीसेन्टर पर जमीन भी आवंटित करने में सहयोग दिया था। चूंकि इसकी जिम्मेदारी हिंदी साहित्य सभा प्रबन्धन ने ली थी ,इसके लिए शुरुआत में कुछ प्रयास भी हुए लेकिन आज तक आवंटित जमीन पर न तो हिंदी भवन बन सका न उसके लिए आवंटित राशि का ही कोई सदुपयोग किया जा सका।
अब बात करते हैं अटलजी की इच्छा से जुड़े दूसरे कार्यक्रम की दौलतंगज के अग्रसेन पार्क के बाहर आज भी मंगोड़े वाली चाची (रामदेवी चौहान) के बेटे रामू उसी स्थान पर दुकान चलाते हैं। रामू बताते हैं कि उनकी मां कहती थी कि अटलजी अपने पिता कृष्ण बिहारी वाजपेयी के साथ उनकी दुकान पर आया करते थे। उन्हें मंगोड़े बेहद पसंद थे। प्रधानमंत्री पद से हटने के बाद 2004 में जब वे अपना जन्मदिन मनाने ग्वालियर आए तो उन्होंने मुरार सर्किट हाउस में मां को मिलने बुलवाया। उन्हें देखकर वे भावुक हो गए और उन्हें एक लाख रुपये का चेक देने लगे। मां ने कहा कि मुझे पैसा नहीं चाहिए, जहां तुम्हें आशीर्वाद दिया था वह जगह मुझे दिलवा दो। अटलजी ने तत्कालीन मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर को अम्मा को गुमटी दिलाने को कहा। आज भी उनका बेटा उसी फुटपाथ पर मंगोड़े बेचता है। दुख का विषय है मंगौड़े वाली चाची अब नहीं हैं और अटलजी भी चले गए उनकी इच्छा अधूरी की अधूरी है। महत्वपूर्ण बात यह है की हिंदी भवन के निर्माण की जिम्मेदारी जिस हिदी साहित्य सभा प्रबन्धन के हाथ थी वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विचारों से संचालित संस्था है साथ ही जिस मंगौड़ेवाली चाची को गुमटी दी जाना थी उसके लिए भाजपा सरकार में मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर
अधिकृत थे अटलजीने अपने खून पसीने से जिस भाजपा को सींचाआज उसे भी अटलजी की इच्छा याद नहीं रही।
