मध्य प्रदेश के कद्दावर नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया कांग्रेस से नाराज चल रहे हैं. सूत्रों के मुताबिक उन्हें मनाने में कांग्रेस अगर सफल नहीं हुई तो भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) उन्हें राज्यसभा भेजने का बड़ा दांव चल सकती है. इससे एक तरफ जहां बीजेपी मध्य प्रदेश में सरकार बनाने में सफल हो जाएगी, तो दूसरी तरफ सिंधिया के रूप में पार्टी को एक और युवा चेहरा मिल जाएगा. लेकिन ऐसा होता है तो भाजपा के भीतर मध्यप्रदेश के कम से कम तीन बड़े नेताओं के राजनीतिक रुतबे पर इसका क्या असर होगा इसपर भी चर्चाओं का बाजार सरगर्म हो गया है। सबसे पहले तो राज्यसभा में जाने की उम्मीद को भी झटका लगेगा क्यों की यह चर्चा है की भाजपा ज्योतिरादित्य को राज्यसभा में पहुंचा सकती है। सर्वविदित है की मध्यप्रदेश में भाजपा की अंदरूनी राजनीति शिवराज सिंह,नरेन्द्र सिंह व कैलाश विजयवर्गीय जैसे नेताओं के इर्दगिर्द घूमती रही है। यदि ज्योतिरादित्य सिंधिया भाजपा में आते हैं तो निःसंदेह मध्यप्रदेश के लिए यह एक बड़ा और दमदार चेहरा होगा। ऐसे में निश्चित रूप से पार्टी को यह तय करना होगा की मध्यप्रदेश की पार्टी पोलटिक्स के इन तीन वजनदारों शिवराज ,कैलाश और नरेंद्र तोमर के साथ ज्योतिरादित्य का सामंजस्य कैसे बिठाया जाएगा ? खुद नरेंद्र सिंह और शिवराज के जहन में यह बात अवस्य होगी की ज्योतिरादित्य सिंधिया कहीं उनके विकल्प के रूप में न खड़े हो जाएं। यह बात सभी भली प्रकार जानते हैं की भाजपा में राजमाता सिंधिया से लेकर वर्तमान में वसुंधरा व यशोधरा राजे तक सिंधिया राजपरिवार का खासा दबदबा रह बावजूद इसके शिवराज सिंह व नरेंद्र तोमर ने आगे बढ़ने कभी भी जयविलास का हाथ नहीं थामा ।
सूत्रों का कहना है कि अगर कांग्रेस से अलग होने के बावजूद सिंधिया किन्हीं कारणों से बीजेपी में शामिल नहीं होते हैं तब भी पार्टी उन्हें बतौर निर्दलीय राज्यसभा भेज सकती है. इस तरह उन्हें मोदी सरकार में भी शामिल होने का मौका मिल सकता है. आज यानी 10 मार्च को उनके पिता माधवराव सिंधिया की 75वीं की जयंती है. ऐसे में चर्चा ये भी है कि क्या इस खास दिन ज्योतिरादित्य सिंधिया कोई बड़ा ऐलान करेंगे?
जब पिता माधवराव हो गए थे कांग्रेस से अलग
आज यह सवाल इसलिए भी मौजू है क्योंकि 1993 में जब मध्य प्रदेश में दिग्विजय सिंह की सरकार थी तब माधवराव सिंधिया ने पार्टी में उपेक्षित होकर कांग्रेस को अलविदा कह दिया था और अपनी अलग पार्टी मध्य प्रदेश विकास कांग्रेस बनाई थी. हालांकि बाद में वे कांग्रेस में वापस लौट गए थे.
वहीं 1967 में जब मध्य प्रदेश में डीपी मिश्रा की सरकार थी तब कांग्रेस में उपेक्षित होकर राजमाता विजयराजे सिंधिया कांग्रेस छोड़कर जनसंघ से जुड़ गई थीं और जनसंघ के टिकट पर गुना लोकसभा सीट से चुनाव भी जीती थीं. मौजूदा सियासी हलचल के बीच अब यह सवाल उठने लगे हैं कि क्या ज्योतिरादित्य सिंधिया भी अपने पिता और दादी की तरह कुछ नया ऐलान करेंगे।