राकेश अचल
जिस दिन भी मुल्क की सबसे बड़ी अदालत से हरी झंडी मिल गयी उसी दिन मध्यप्रदेश के बक्सवाहा के जंगलों में सामूहिक ”वृक्ष संहार ” शुरू हो जाएगा .बक्सवाहा में तीन लाख से ज्यादा हरे-भरे वृक्ष काटे जाने की योजना है .लेकिन आपको जानकार हैरानी होगी कि सरकार ने ये मानकर कि फैसला उसके हक में ही आएगा ,इस संहार की ‘रिहर्सल ‘ग्वालियर में शुरू कर दी है .मध्यप्रदेश सरकार ग्वालियर में थाटीपुर पुनर्घनत्वीकरण योजना के तहत कोई 368 हरेभरे पेड़ काटने में जुट गयी है .
हरियाली के खिलाफ मध्यप्रदेश सरकार की इस योजना का प्रबल विरोध शुरू हो गया है. इन सैकड़ों पेड़ों को बचाने के लिए एक तरफ हस्ताक्षर अभियान चलाया जा रहा है ,वहीं धरने-प्रदर्शन और कानूनी लड़ाई की तैयारियां भी की जा रही हैं .थाटीपुर इलाके में कोई 800 शासकीय आवासों को जमीदोज कर वहां नए सिरे से शॉपिंग काम्प्लेक्स कम आवास बनाये जाने का काम मध्यप्रदेश गृह निर्माण मंडल को सौंपा गया है .जानकारों का कहना है कि काटे जा रहे पेड़ों पर कोई दो लाख पक्षियों का बसेरा भी है
मध्यप्रदेश सरकार की थाटीपुर पुनर्घनत्वीकरण योजना कोई डेढ़ दशक पुरानी है ,लेकिन धन अभाव की वजह से ये योजना अब तक लागू नहीं की जा सकी थी .ग्वालियर के ही एक प्रशासकीय अधिकारी ने इस परियोजना की रूप रेखा बनाकर सरकार को दी थी.सरकार को ये योजना ‘हल्दी लगे ,न फिटकरी और रंग चोखा आ जाये’ वाली लगी थी ,क्योंकि इस योजना के लिए उसे केवल अपनी जमीन में पूंजी लगाने वालों को शामिल करना था .इस योजना के लिए प्रदेश के एक शराब कारोबारी ने ठेका भी ले लिया था किन्तु मनमानी शर्तें स्वीकार न किये जाने की वजह से ठेकेदार ने हाथ खड़े कर दिए और सरकार को मुफ्त में ठेकेदार की दो करोड़ की धरोहर राशि जब्त करने का मौक़ा मिल गया था .
दरअसल प्रदेश में पुनर्घनत्वीकरण योजना के अपने खराब अनुभवों क देखते हुए प्रदेश सरकार ने इस योजना से पल्ला झाड़ लिया था लेकिन एक बार फिर ग्वालियर से बैर रखने वाले प्रशासनिक अफसरों ने साजिश कर इस योजना को दोबारा ज़िंदा कर ये काम मध्यप्रदेश गृह निर्माण मंडल को दिला दिया .ग्वालियर में मंडल ने एक-दो आवासीय कालोनियों और एक-दो व्यावसायिक काम्प्लेक्स बनाने के अलावा कुछ किया ही नहीं था ,लेकिन अब मंडल इस पुनर्घनत्वीकरण योजना के जरिये मालामाल होना चाहता है .लेकिन योजना को पूरा करने से पहले इस जमीन पर चौतरफा फैली हरियाली का खात्मा करने के लिए मंडल को 368 पेड़ काटना पड़ रहे हैं .
थाटीपुर पुनर्घनत्वीकरण योजना पहले से अराजक हो रहे ग्वालियर को और मुश्किलों में डालने वाली योजना है .लेकिन किसी को इससे क्या लेनादेना ?ये योजना केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर के गृहक्षेत्र में आती है. आजादी से पहले यहां अंग्रेजी फ़ौज की 34 बटालियन की बैरीकें थीं.आजादी के बाद इन्हें शासकीय आवासों में बदल दिया गया ,साथ ही समय-समय पर नए शासकीय आवास बना दिए गए.एक हिस्से में मध्यप्रदेश हाउसिंग बोर्ड ने एक छोटी रिहायशी बस्ती बसा दी,इसके लिए भी सैकड़ों वृक्षों की बलि ली जा चुकी है .
एक तरह से उपनगर मुरार की हरीतिमा माने जाने वाली इस कालोनी में जितने भी पेड़ हैं वे सब के सब फलदार हैं और दशकों पुराने हैं .जिन पेड़ों की वजह से इस इलाके का पर्यावरण संतुलन बना हुआ है .ग्वालियर के तत्कालीन कलेक्टर आकाश त्रिपाठी ने इस योजना के लिए सरकारी आवास खाली कराने की मुहीम चलाई भी थी,उन्होंने काटे जाने वाले पौधों के एवज में कुछ पौधे भी लगवाए भी थे किन्तु वे सांकेतिक तोड़फोड़ के बाद शेष आवास खाली करने में कामयाब होते इससे पहले उनका तबादला हो गया .2007 से अब तक इस कालोनी में बने सरकारी आवासों की मरम्मत पर सरकार सालों लाखों रूपये खर्च करती है. यहां एक स्कूल और कुछ पूजाघर भी हैं ,इन्हें भी पेड़ों के साथ हटाया जाना है .
ग्वालियर प्रदेश का इकलौता ऐसा अभागा शहर है जहां आजादी के बाद से ढंग का एक बागीचा नहीं बनाया गया .ग्वालियर के विकास के लिए सरकार के पास कोई योजना है ही नहीं और जो योजनाएं अतीत में बनाई भी गयीं वे भी पूरी नहीं हुईं.लेकिन सरकार न जाने क्यों शहर की हरियाली को चौपट कर थाटीपुर पुनर्घनत्वीकरण योजना के पीछे पड़ी है. योजना का कर्यान्वयन करने वाली एजेंसी कहती है कि इस योजना के तहत जितने पेड़ काटे जायेंगे उनसे तीन गुना नए लगा दिए जायेंगे ,साथ ही पेड़ काटने के बजाय उनके विस्थापन का प्रयास किया जाएगा .
ग्वालियर में पिछले सत्तर साल में केवल दो पुराने पेड़ विस्थापित करने की कोशिश की गयी थी लेकिन एक भी पेड़ जीवित नहीं रह पाया ,क्योंकि सरकार के पास इसकी तकनीक ही नहीं है .इसलिए किसी को भी हाऊसिंग बोर्ड के दावे पर यकीन नहीं है .बोर्ड चाहे तो इन 368 पेड़ों को विस्थापित या काटे बिना भी अपनी योजना पर अमल कर सकता है लेकिन उसे इसमें मुनाफ़ा नजर नहीं आता. बोर्ड को एक-एक इंच जमीन खाली चाहिए .कायदे से इतनी बड़ी संख्या में पेड़ हटाने या काटने के लिए बोर्ड को एनजीटी से अनुमति लेना चाहिए थी लेकिन इसके लिए नगर निगम को ही सक्षम एजेंसी मानकर अनुमति का नाटक खेल लिया गया है
शहर में हरियाली बचने के लिए जन-जागरण करने वाली संस्थाओं ने इस परियोजना के तहत आने वाले पेड़ों को बचने के लिए आंदोलन शुरू कर दिया है. .ग्वालियर व्यापार मेला प्राधिकरण के पूर्व अध्यक्ष राज चढ्ढा कहते हैं कि -हम किसी भी सूरत में इतनी बड़ी संख्या में पेड़ों को काटने या हटने नहीं देंगे .हरियाली गैंग चलने वाले सुधीर सप्रा इस परियोजना को ही अविवेकपूर्ण बताते हैं .सप्रा अतीत में प्रख्यात पर्यावरणविद स्वर्गीय अनुपम मिश्र के साथ ग्वालियर में पेड़ों को बचाने के आंदोलन कर चुके हैं .शहर की एक वीरान पहाड़ी पर एक नया जंगल उगाने वाली संस्था से जुड़े इंद्रदेव सिंह का कहना है कि इस योजना पर तत्काल रोक लगाईं जाना चाहिए ,वे भी इस योजना के खिलाफ शुरू किये आंदोलन से जुड़े हुए हैं .
ग्वालियर का दुर्भाग्य ये है कि बात-बात पर खटिया डालकर सत्याग्रह करने वाले स्थानीय मंत्री प्रद्युम्न सिंह और विधायक इस सामूहिक वृक्ष संहार के मामले में सत्याग्रह करने का साहस नहीं जुटा पा रहे हैं .इस क्षेत्र के विधायक कांग्रेस भी अब तक मौन हैं,सांसद तो भाजपा के हैं इसलिए वे तो बोलने से रहे .अब केवल शहर की जनता इन पेड़ों को मरने से बचने के लिए मोर्चा ले रही है .देखना है की ये पेड़ बचते हैं या इन पेड़ों के जरिये बक्स्वाहा में किया जाने वाला वनसंहार का पूर्व्वभ्यास कामयाब होता है?
@ राकेश अचल
