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भाजपा की पदयात्राओं से ग्वालियर बाहर क्यों ? क्या गुटबाजी और जनआक्रोश से भयभीत है शीर्ष नेतृत्व

प्रवीण दुबे 

लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ’ अभियान, हेतु इंदौर, जबलपुर और भोपाल में  एक लाख का लक्ष्य लेकिन ग्वालियर को  नहीं मिली जगह? क्या स्थानीय राजनीतिक समीकरण बने वजह?

ग्वालियर, 29 अक्टूबर 2026/भारतीय जनता पार्टी ने मध्यप्रदेश में ‘लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ’ अभियान के तहत प्रदेश के तीन प्रमुख शहरों इंदौर, जबलपुर और भोपाल में पदयात्राएं आयोजित करने का निर्णय लिया है। इंदौर में 30 अक्टूबर, जबलपुर में 3 नवंबर और भोपाल में 4 नवंबर को प्रस्तावित इन पदयात्राओं में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव, भाजपा प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल और पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के शामिल होने का कार्यक्रम है। इन आयोजनों में केंद्रीय मंत्रियों के शामिल होने की संभावना भी जताई गई है।

पार्टी ने प्रत्येक पदयात्रा में एक लाख लोगों की भागीदारी का लक्ष्य निर्धारित किया है। युवाओं और छात्रों को भी इन आयोजनों से जोड़ने की तैयारी है। लेकिन इस पूरे कार्यक्रम में प्रदेश के चौथे प्रमुख महानगर ग्वालियर को जगह नहीं मिलने से राजनीतिक हलकों में सवाल उठने लगे हैं। आखिर ऐसा क्या कारण रहा कि प्रदेश के तीन बड़े शहरों को चुना गया, लेकिन ग्वालियर को इस अभियान से बाहर रखा गया?

ग्वालियर की अनदेखी या कोई खास राजनीतिक रणनीति?

ग्वालियर केवल एक प्रमुख शहर ही नहीं, बल्कि मध्यप्रदेश की राजनीति का महत्वपूर्ण केंद्र भी है। यहां भाजपा का मजबूत राजनीतिक आधार रहा है और पार्टी के कई बड़े नेता इस क्षेत्र की राजनीति को प्रभावित करते हैं। ऐसे में प्रदेशव्यापी राजनीतिक अभियान से ग्वालियर का बाहर रहना स्वाभाविक रूप से चर्चा का विषय बन गया है।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या ग्वालियर को शामिल नहीं करने के पीछे केवल संगठनात्मक या कार्यक्रम संबंधी कारण हैं, अथवा स्थानीय राजनीतिक परिस्थितियों ने भी पार्टी के निर्णय को प्रभावित किया है?

इस सवाल को इसलिए भी बल मिलता है क्योंकि ग्वालियर-चंबल अंचल में भाजपा के वरिष्ठ नेताओं के बीच राजनीतिक प्रभाव और नेतृत्व को लेकर समीकरण लंबे समय से चर्चा में रहते हैं। हालांकि, ग्वालियर को पदयात्राओं में शामिल नहीं करने के पीछे गुटबाजी को आधिकारिक कारण नहीं बताया गया है।

सिंधिया, नरेंद्र सिंह तोमर और भारत सिंह कुशवाह के समर्थकों के बीच वर्चस्व का समीकरण चर्चा में

ग्वालियर-चंबल की राजनीति में केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया, विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर और ग्वालियर के सांसद भारत सिंह कुशवाह की राजनीतिक भूमिका महत्वपूर्ण है। इन नेताओं के अपने-अपने समर्थक और क्षेत्रीय प्रभाव हैं। स्थानीय राजनीति में अलग-अलग नेताओं के समर्थकों के बीच समीकरणों को लेकर समय-समय पर चर्चाएं भी होती रही हैं।

ऐसे में सवाल उठता है कि क्या भाजपा का प्रदेश नेतृत्व ग्वालियर में किसी बड़े आयोजन के दौरान स्थानीय नेताओं और उनके समर्थकों के बीच बेहतर समन्वय सुनिश्चित करने को लेकर अतिरिक्त सावधानी बरत रहा है?

क्या पार्टी को यह आशंका है कि स्थानीय स्तर पर नेतृत्व के समीकरणों का असर पदयात्रा की तैयारियों और कार्यकर्ताओं की भागीदारी पर पड़ सकता है? या फिर ग्वालियर को शामिल नहीं करने के पीछे कोई दूसरी संगठनात्मक रणनीति है?

इन सवालों का जवाब पार्टी नेतृत्व ही दे सकता है। फिलहाल, ग्वालियर को कार्यक्रम में जगह नहीं मिलने के कारणों को लेकर कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण सामने नहीं आया है।

कार्यकर्ताओं की नाराजगी भी कारण

ग्वालियर-चंबल अंचल में भाजपा के सामने केवल नेताओं के बीच समन्वय का सवाल ही नहीं है, बल्कि कार्यकर्ताओं की अपेक्षाओं और स्थानीय समस्याओं को लेकर जनता के बीच पार्टी की छवि भी महत्वपूर्ण है।

राजनीतिक संगठनों की मजबूती केवल बड़े नेताओं की मौजूदगी से नहीं, बल्कि जमीनी कार्यकर्ताओं की सक्रियता और आम लोगों से उनके जुड़ाव से तय होती है। यदि स्थानीय कार्यकर्ताओं में उपेक्षा की भावना हो या उनकी समस्याओं को पर्याप्त महत्व नहीं मिले, तो बड़े आयोजनों में अपेक्षित भागीदारी जुटाना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

ऐसे में यह सवाल प्रासंगिक है कि क्या भाजपा का प्रदेश नेतृत्व ग्वालियर में किसी बड़े कार्यक्रम से पहले स्थानीय संगठन की स्थिति, कार्यकर्ताओं के उत्साह और जनसमर्थन का आकलन कर रहा है?

हालांकि, ग्वालियर में प्रस्तावित पदयात्रा को लेकर कार्यकर्ताओं की संभावित भागीदारी या भीड़ जुटाने की कठिनाई के संबंध में पार्टी की ओर से कोई आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है।

सड़क, बिजली और पानी की समस्याओं से जनता भी असंतुष्ट

ग्वालियर में सड़क, बिजली, पेयजल और नगर निगम से जुड़ी नागरिक सुविधाएं लंबे समय से स्थानीय जनचर्चा के महत्वपूर्ण विषय रहे हैं। खराब सड़कों, पेयजल आपूर्ति में परेशानी, बिजली संबंधी शिकायतों और अन्य बुनियादी सुविधाओं को लेकर नागरिकों की नाराजगी किसी भी राजनीतिक दल के लिए चुनौती बन सकती है।

ऐसे में भाजपा के सामने सवाल है कि क्या वह केवल राजनीतिक अभियानों के माध्यम से जनता तक पहुंचना चाहती है, या स्थानीय समस्याओं के समाधान को भी उतनी ही प्राथमिकता दे रही है?

‘लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ’ जैसे अभियान की प्रभावशीलता का आकलन जनता अपने स्थानीय अनुभवों के आधार पर भी करती है। यदि नागरिक रोजमर्रा की समस्याओं से परेशान हैं, तो उनके बीच किसी राजनीतिक नारे की स्वीकार्यता इस बात पर भी निर्भर कर सकती है कि उनकी समस्याओं का समाधान कितना प्रभावी ढंग से किया जा रहा है।

इसलिए ग्वालियर में किसी बड़े राजनीतिक आयोजन से पहले स्थानीय मुद्दों पर काम करना और जनता का भरोसा मजबूत करना भाजपा के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है।

एक लाख लोगों की भागीदारी का लक्ष्य, फिर ग्वालियर से परहेज क्यों?

भाजपा ने इंदौर, जबलपुर और भोपाल की पदयात्राओं में एक-एक लाख लोगों को शामिल करने का लक्ष्य रखा है। इतने बड़े स्तर पर भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए संगठनात्मक तैयारी, कार्यकर्ताओं का समन्वय और जनता का समर्थन महत्वपूर्ण होगा।

ऐसे में ग्वालियर को अभियान से बाहर रखने का फैसला कई सवाल खड़े करता है। क्या पार्टी ने प्रदेश के तीन शहरों को चुनने के लिए कोई विशेष राजनीतिक या संगठनात्मक मानदंड तय किया है? क्या ग्वालियर में भी इसी तरह की पदयात्रा आयोजित करने की कोई योजना है? या फिर स्थानीय परिस्थितियों को देखते हुए फिलहाल इस शहर को अभियान से दूर रखा गया है?

इन सवालों का स्पष्ट जवाब सामने आने पर ही इस फैसले के पीछे की वास्तविक वजह समझी जा सकेगी।

भाजपा नेतृत्व के सामने बड़ा सवाल

ग्वालियर भाजपा के लिए राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण क्षेत्र है। ऐसे में प्रदेश के प्रमुख शहरों में आयोजित होने वाले अभियान से इसका बाहर रहना पार्टी के स्थानीय नेतृत्व और संगठनात्मक प्राथमिकताओं पर चर्चा का अवसर जरूर देता है।

यदि ग्वालियर को बाहर रखने का कारण केवल कार्यक्रम की रूपरेखा है, तो पार्टी को इसे स्पष्ट करने में कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए। लेकिन यदि स्थानीय संगठन की चुनौतियां, नेताओं के बीच समन्वय या जनता की समस्याएं इस निर्णय के आकलन का हिस्सा रही हैं, तो यह भाजपा के लिए आत्ममंथन का विषय हो सकता है।

सबसे अहम सवाल यही है कि जब भाजपा प्रदेश के प्रमुख शहरों में बड़े राजनीतिक अभियान के जरिए अपनी ताकत दिखाने की तैयारी कर रही है, तब ग्वालियर को इस अभियान में स्थान क्यों नहीं मिला? क्या यह महज संगठनात्मक संयोग है या ग्वालियर की स्थानीय राजनीतिक परिस्थितियों की ओर इशारा करता कोई महत्वपूर्ण संकेत?

अब निगाहें भाजपा के प्रदेश नेतृत्व पर हैं कि वह ग्वालियर को पदयात्राओं से बाहर रखने के कारणों पर क्या स्पष्टीकरण देता है और क्या भविष्य में इस क्षेत्र में भी ऐसा कोई बड़ा आयोजन प्रस्तावित है।

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