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भारत में आज भी जिंदा है गुरु तेगबहादुरजी की हत्या करने वाली औरंगजेबी मानसिकता

सिखों के नोवें गुरु तेगबहादुरजी के 400 वें प्रकाश वर्ष पर मध्यप्रदेश की ऐतिहासिक नगरी ग्वालियर में 1 मई को आयोजित कार्यक्रम पर विशेष 
देश इस समय सिखों के नवें गुरु श्रध्देय तेगबहादुर जी का चार सौ वां प्रकाश वर्ष मना रहा है। गुरु तेगबहादुर का बलिदान आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना कि चार सौ वर्ष पूर्व था,ऐसा इसलिए क्यों कि आज भी आस्तीन के सांपों  की तर्ज पर औरंगजेबी मानसिकता के जिहादी मौजूद हैं वे आज भी तलवार की दम पर इस देश में गजवा ए हिंद का स्वप्न संजोए हुए हैं धर्म परिवर्तन का काला सच आज भी हमे चुनौती दे रहा है। लेकिन ऐसा करने वाली औरंगजेबी मानसिकता के कठमुल्लों को यह नहीं भूलना चाहिए कि धर्म के लिए अपना शीश न्यौछावर करने वाले गुरु तेगबहादुर के 400 वें प्रकाश वर्ष के उपलक्ष्य में यह देश उनके बलिदान का कर्ज चुकाने तैयार खड़ा है सम्भल जाओ लुटेरे और आक्रांता मुगलों को अपना पूर्वज मानने वालों यहां अब औरंगजेबी मानसिकता को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा यदि इस देश में रहना है तो बाबर और औरंगजेब की जगह इस देश के मानबिन्दुओं का संस्कृति का और यहां की पवित्र माटी का सम्मान सभी को करना ही होगा। यही गुरु तेगबहादुरजी को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
भारतीय सांस्कृतिक पृष्ठभूमि अनेक धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं से मिलकर बनी है. धार्मिक और सांस्कृतिक तौर पर अत्याधिक भिन्नता होने के बावजूद भारत एक ऐसा राष्ट्र है जहां सभी धर्मों को बराबर मान-सम्मान और अधिकार दिए गए हैं. लेकिन पहले ऐसा नहीं था क्योंकि तब अधिकार केवल जंग और शहादत पर ही निर्भर होते थे. यही वजह है कि यहां समय-समय पर विभिन्न धर्मों के लोगों द्वारा आक्रमण और जीत दर्ज की जाती रही. अंग्रेजी हुकूमत आने से पहले यहां राजकीय स्थिरता जैसी कोई बात नजर नहीं आती थी. पंथ की स्थापना के लिए आक्रमण और अतिक्रमण जैसे माहौल के बीच यहां शासन की बागडोर संभाली जाती थी. लेकिन जब धर्म के नाम पर मरने-मिटने की बात आती है तो सिख समुदाय का नाम हमेशा ही सम्मान के साथ लिया जाता है. सिखों के नौवें गुरु, गुरु तेग बहादुर ऐसी ही एक शख्सियत हैं जिन्होंने सिख धर्म के सम्मान को बरकरार रखने के लिए अपनी जान की भी कोई परवाह नहीं की.

गुरु तेग बहादुर का जीवन

 

श्री गुरु तेग बहादुर जी सिखो के नौवें गुरु थे। उन्होने कश्मीरी पंडितों तथा अन्य हिन्दुओं को बलपूर्वक मुसलमान बनाने का विरोध किया। 1675 में मुगल शासक औरंगजेब ने उन्हे इस्लाम स्वीकार करने को कहा। पर गुरु साहब ने कहा सीस कटा सकते हैं, केश नहीं। फिर उसने सबके सामने उनका सिर कटवा दिया। गुरुद्वारा शीशगंज साहिब तथा गुरुद्वारा रकाबगंज साहिब उन स्थानों का स्मरण दिलाते हैं जहाँ गुरुजी की हत्या की गयी तथा जहाँ उनका अन्तिम संस्कार किया गया। विश्व इतिहास में धर्म एवं मानवीय मूल्यों, आदर्शों एवं सिद्धान्त की रक्षा के लिए प्राणों की आहुति देने वालों में गुरु तेग बहादुर साहब का स्थान अद्वितीय है।

गुरु हरगोविन्द सिंह के पांचवें पुत्र, गुरु तेग बहादुर का जन्म अमृतसर (पंजाब) में हुआ था. सिखों के आठवें गुरु ‘हरिकृष्ण राय’ जी की अकाल मृत्यु हो जाने के कारण जनमत द्वारा गुरु तेगबहादुर को गुरु बनाया गया था. गुरुतेग बहादुर के बचपन का नाम त्यागमल था. 14 वर्ष की छोटी सी आयु में अपने पिता के साथ मुगलों के हमले के खिलाफ हुए युद्ध में उन्होंने वीरता का परिचय दिया था. उनकी वीरता से प्रभावित होकर उनके पिता ने उनका नाम त्यागमल से तेगबहादुर (तलवार के धनी) रख दिया.

धैर्य, वैराग्य और त्याग की मूर्ति गुरु तेगबहादुर जी ने एकांत में लगातार 20 वर्ष तक ‘बाबा बकाला’ नामक स्थान पर साधना की. गुरु तेग बहादुर जी ने धर्म के प्रसार लिए कई स्थानों का भ्रमण किया. आनंदपुर साहब से रोपण, सैफाबाद होते हुए वे खिआला (खदल) पहुंचे. इसके बाद गुरु तेगबहादुर जी प्रयाग, बनारस, पटना, असम आदि क्षेत्रों में गए, जहां उन्होंने आध्यात्मिक, सामाजिक, आर्थिक विकास के लिए कई कार्य किए. गुरु तेग बहादुर जी ने रूढ़ियों, अंधविश्वासों की घोर आलोचनाएं की और विभिन्न आदर्श स्थापित किए. सामाजिक हित में कार्य करते हुए उन्होंने कई कुएं खुदवाए और धर्मशालाएं बनवाई.

सिख धर्म के सम्मान के लिए हो गए कुर्बान

 

औरंगजेब के दरबार में एक विद्वान पंडित रोज़ गीता के श्लोक पढ़ता और उसका अर्थ सुनाता था, पर वह पंडित गीता में से कुछ श्लोक छोड़ दिया करता था. एक दिन पंडित बीमार हो गया और औरंगजेब को गीता सुनाने के लिए उसने अपने बेटे को भेज दिया परन्तु उसे बताना भूल गया कि उसे किन-किन श्लोकों का अर्थ राजा को नहीं बताना. पंडित के बेटे ने जाकर औरंगजेब को पूरी गीता का अर्थ सुना दिया. गीता का पूरा अर्थ सुनकर औरंगजेब को यह ज्ञान हो गया कि प्रत्येक धर्म अपने आपमें महान है किन्तु औरंगजेब की हठधर्मिता थी कि उसे अपने धर्म के धर्म के अतिरिक्त किसी दूसरे धर्म की प्रशंसा सहन नहीं थी.

औरंगजेब ने सबको इस्लाम धर्म अपनाने का आदेश दे दिया और संबंधित अधिकारी को यह कार्य सौंप दिया. औरंगजेब ने कहा, “सबसे कह दो या तो इस्लाम धर्म कबूल करें या मौत को गले लगा लें.” औरंगजेब के जुल्मों से त्रस्त आकर कश्मीर के पंडित गुरु तेगबहादुर के पास आए और उन्हें बताया कि किस प्रकार ‍इस्लाम को स्वीकार करने के लिए अत्याचार किया जा रहा है, यातनाएं दी जा रही हैं और उनसे अपने धर्म को बचाने की गुहार लगाई.

तत्पश्चात गुरु तेग बहादुर जी ने पंडितों से कहा कि आप जाकर औरंगजेब से कह ‍दें कि यदि गुरु तेग बहादुर ने इस्लाम धर्म ग्रहण कर लिया तो उनके बाद हम भी इस्लाम धर्म ग्रहण कर लेंगे और यदि आप गुरु तेग बहादुर जी से इस्लाम धारण नहीं करवा पाए तो हम भी इस्लाम धर्म धारण नहीं करेंगे’. औरंगजेब ने यह स्वीकार कर लिया.

गुरु तेगबहादुर दिल्ली में औरंगजेब के दरबार में स्वयं गए. औरंगजेब ने उन्हें बहुत से लालच दिए, पर गुरु तेगबहादुर जी नहीं माने तो उन पर ज़ुल्म किए गये, उन्हें कैद कर लिया गया, दो शिष्यों को मारकर गुरु तेगबहादुर जी को ड़राने की कोशिश की गयी, पर वे नहीं माने. उन्होंने औरंगजेब से कहा – ‘यदि तुम ज़बरदस्ती लोगों से इस्लाम धर्म ग्रहण करवाओगे तो तुम सच्चे मुसलमान नहीं हो क्योंकि इस्लाम धर्म यह शिक्षा नहीं देता कि किसी पर जुल्म करके मुस्लिम बनाया जाए

शीशगंज साहिब की स्थापना

औरंगजेब यह सुनकर आगबबूला हो गया. उसने दिल्ली के चांदनी चौक पर गुरु तेग बहादुर जी का शीश काटने का हुक्म ज़ारी कर दिया और गुरु तेग बहादुर जी ने हंसते-हंसते बलिदान दे दिया. गुरु तेग बहादुर जी की याद में उनके ‘शहीदी स्थल’ पर गुरुद्वारा बना है, जिसका नाम गुरुद्वारा ‘शीश गंज साहिब’ है.

 

गुरु तेग बहादुर जी द्वारा रचित बहुत सी कृतियां ग्रंथ साहब के महला 9 में संग्रहित हैं. इन्होंने शुद्ध हिन्दी में सरल और भावयुक्त ‘पदों’ और ‘साखी’ की रचनाएं की हैं.

गुरु तेग बहादुर – हिंद दी चादर

सिख इतिहास के अनुसार, दिल्ली में लाल किले के सामने जहां आज गुरुद्वारा सीसगंज साहिब स्थित है, वहां श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी का सिर शरीर से अलग कर दिया गया था.

शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी की किताब ‘सिख इतिहास’ के अनुसार, गुरु तेग बहादुर के सामने उनको मारे जाने से पहले तीन शर्तें रखी गई थीं – कलमा पढ़कर मुसलमान बनने की, चमत्कार दिखाने की या फिर मौत स्वीकार करने की.

गुरु तेग बहादुर ने शांति से उत्तर दिया था, ”हम ना ही अपना धर्म छोड़ेंगे और ना ही चमत्कार दिखाएंगे. आपने जो करना है कर लो, हम तैयार हैं.”

इतिहासकार प्रोफ़ेसर करतार सिंह अपनी पुस्तक ‘सिख इतिहास – भाग 1’ में लिखते हैं, “समाने के सैयद जलालुद्दीन जल्लाद ने अपनी तलवार खींची और गुरु जी का सिर तलवार से अलग कर दिया गया.”

ये घटना 11 नवंबर 1675 की है

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