Homeसम्पादकीयमन को सुखद अनभूति कराती छात्र आंदोलन की यह तस्वीर

मन को सुखद अनभूति कराती छात्र आंदोलन की यह तस्वीर

प्रवीण दुबे

ग्वालियर के जीवाजी विश्वविद्यालय से मंगलवार को एक सुखद तस्वीर सामने आई उपरोक्त तस्वीर को सुखद बताने पर कुछ लोगों को आश्चर्य लग सकता है वह इसलिए क्यों कि इस तस्वीर में एक तरफ कुछ छात्र दिखाई दिए तो दूसरी तरफ उनपर वाटर केनन से पानी फैंकता वाहन व हाथों से डंडे चलाते पुलिस कर्मी। इस दृश्य में छात्रों का जोरदार प्रदर्शन नजर आ रहा है। मैंने इस तस्वीर को सुखद इस कारण माना क्यों कि लंबे समय बाद जीवाजी विश्यविद्यालय में कोई  बड़ा छात्र आंदोलन दिखाई दिया। वर्तमान समय में इसे हमारे लोकतंत्र की विडंबना ही कहना चाहिए कि अब छात्र आंदोलन जैसे समाप्त से हो गए है महाविधायलयों, विश्वविद्यालयों में अब छात्रहित में संघर्ष करते ऊर्जावान युवाओं की टोलियां बहुत कम ही दिखाई देती हैं। छात्र आंदोलन जैसे मूर्छित सा हो गया है। कांधे पर पिट्ठू बैग लटकाए छात्र छात्राएं तो दिखाई  देते हैं लेकिन छात्र हित की राजनीति से उन्होंने जैसे पूरी तरह किनारा कर लिया है। हमारे शिक्षा केंद्रों से विलुप्त से होती छात्र आंदोलन की बहुत पुरानी परंपरा के हमारे लोकतंत्र पर बड़े भयंकर दुष्परिणाम सामने आए हैं। छात्र आंदोलनों के माध्यम से  जो देशप्रेम से युक्त परिपक्व  युवा  राजनीति में आते थे वो अब दिखाई नहीं देते उनकी जगह  कन्हैया कुमार जैसे युवाओ ने लेली जिनसे राजनीति को नुकसान ज्यादा लाभ कम हुआ है। इसके पीछे देश के कई बड़े विष्यविद्यालयों महाविद्यालयों में  बैठे अर्बन नक्सलाइट व राष्ट्रहित को दरकिनार कर कार्य करने वाले शिक्षकों  द्वारा तमाम विधार्थियों के अपरिपक्व मन में जहर घोलने का षडयंत्र चलता है परिणामस्वरूप शर्जील इमाम कन्हैया कुमार जन्म लेते हैं। आजादी के पहले से लेकर आजादी के बाद तक का हमारा इतिहास इस बात का गवाह रहा है कि हमारे देश में छात्र आंदोलन की सशक्त व गौरवशाली परम्परा रही है। जयप्रकाश नारायण के छात्र आंदोलन से ही भारतीय लोकतंत्र को अनेक अच्छे नेता मिले हैं । छात्र आंदोलन से निकले नेताओं की फेहरिस्त बहुत लंबी है। ग्वालियर की ही बात करें तो आज भी तमाम नेता सहित विविध क्षेत्रों में ऐसे लोग सक्रीय हैं जिन्होंने अपने राजनीतिक जीवन से पूर्व छात्र आंदोलनों में जमकर भाग लिया। अस्सी के दशक तक कॉलेज व यूनिवर्सिटी में होने वाले छात्रसंघ चुनाव को आज भी पुराने लोग याद करते हैं। अब छात्रसंघ चुनाव में विद्यार्थियों की सीधी सहभागिता नहीं रही ,केवल खानापूर्ति होने से युवाओं की छात्र राजनीति के प्रति उदासीनता दिखाई देती है । ऐसे माहौल में जीवाजी यूनिवर्सिटी में छात्रहित को लेकर आंदोलन करते युवाओं ने निर्जीव पड़े छात्र आंदोलन को ऑक्सीजन जरूर प्रदान की है । लेकिन यह भी कटु सत्य है कि जो आंदोलन दिखाई दिया उसमें काफी संख्या में एक राजनीतिक दल से जुड़े चेहरे ज्यादा नजर आए मेरा मत है कि यह स्थिति भी इस कारण पैदा हुई क्यों कि कैम्पस में छात्र राजनीति को लेकर विद्यार्थियों के बीच उदासीनता का माहौल व्याप्त हो चला है इसे बदलना होगा यदि कैम्पस अर्थात कॉलेज यूनिवर्सिटी के भीतर वहीं के छात्र  विद्यार्थी हितों की बातों को उठाएंगे उनमें रुचि लेंगे तो बाहरी तत्वों का या अपना राजनीतिक उल्लू सीधा करने वालों का प्रवेश स्वतः ही समाप्त हो जाएगा।

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