प्रवीण दुबे
ऐसा लगता है कम्युनिस्टों को देश में शांति पसंद नहीं है चाहे कितना ही शुभ दिन हो ,शुभ संदेश हो उन्हें तो विवाद ही खड़ा करना है। इसके लिए हमारे वामपंथी भाई यह भी विचार नहीं करते हैं कि पूरी दुनिया खासकर हमारे विरोधी मुल्कों जैसे कि पाकिस्तान, चीन आदि तक कितना गलत संदेश जाएगा। देश ने उनकी इस आचरण हीनता को कई बार देखा है। आज जब देश संविधान लागू होने की 73 वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में गणतंत्र दिवस पर उल्लासित है तब एक वरिष्ठ कामरेड नेता ने सरकार की ओर से दिए जाने वाले

पद्म विभूषण सम्मान को लेने से इंकार करके विवाद को जन्म दे दिया है। यह कोई नई बात नहीं है दो वर्ष पूर्व भी कुछ कम्युनिस्ट मानसिकता से प्रेरित साहित्यकारों, कलाकारों आदि ने भी सरकार पर असहष्णुता का आरोप लगाकर अपने पुरस्कारों को लौटाकर देश में विवाद खड़ा करने की कोशिश की थी। लोकतंत्र में सरकार की नीतियों, रीतियों के खिलाफ विरोध,धरना,प्रदर्शन करना अथवा अपनी बात रखने का अधिकार न केवल विपक्ष को बल्कि देश के प्रत्येक नागरिक को प्राप्त है लेकिन किसी राष्ट्रीय पर्व पर अथवा जिन विषयों से हमारे देश का राष्ट्रीय गौरव निहित है उनको लेकर विवाद खड़ा करना अथवा उनको टार्गेट करके अपना राजनीतिक उल्लू सीधा करने की कोशिश करना न केवल गलत है बल्कि देश और इस देश की करोड़ों राष्ट्रभक्त जनता का अपमान भी है। ऐसा ही एक दृश्य बीते वर्ष भी देश देख चुका है जब किसान आंदोलन की आड़ में कुछ देश विरोधी ताकतों ने बवंडर खड़ा करने के लिए 26 जनवरी का ही दिन चुना था और न केवल हिंसा की गई बल्कि हमारे राष्ट्रीय ध्वज का अपमान करके खलिस्तान समर्थक नारे लगाए गए। कम्युनिस्ट नेता बुद्धदेव भट्टाचार्य देश के सीनियर कम्युनिस्ट नेता हैं वे पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री भी रहे हैं । उनकी राजनीतिक सामाजिक उपलब्धियों को दृष्टिगत रखते हुए ही उनका चयन इस महत्वपूर्ण राष्ट्रीय सम्मान के लिए किया गया,यही सम्मान कांग्रेस के नेता गुलाम नबी आजाद को भी देने की घोषणा की गई है। निःसंदेह केंद्र सरकार की इसके लिए तारीफ की जाना चाहिए कि उन्होंने राजनीति को परे रखकर अपने विरोधियों के सामाजिक राजनीतिक योगदान की कद्र की और पदम् पुरस्कारों के लिये उनका चयन किया। तारीफ करना होगी ग़ुलाम नबी जैसे राजनीतिज्ञों की कि उन्होंने बिना कुछ बोले इस राष्ट्रीय सम्मान को स्वीकार किया लेकिन दुख की बात है कि बदलते हुए देश के साथ कम्युनिस्ट आज भी अपनी मानसिकता को बदल नहीं सके हैं । गाहे बगाहे देश व देश के खिलाफ उनके बयानों की मातमी धुन सुनाई देती रहती है। पद्म भूषण सम्मान के लिए अपना नाम सामने आने के बाद बुद्धदेव भट्टाचार्य ने अपनी पार्टी के साथियों के जरिए बयान जारी कर कहा है कि, ‘मैं पद्म भूषण सम्मान के बारे में कुछ नहीं जानता। इस बारे में किसी ने भी कुछ नहीं बताया है। यदि मुझे पद्म भूषण सम्मान दिया गया है तो फिर मैं इसे अस्वीकार करता हूं।’ उनके इस इनकार के बाद विवाद तेज हो गया है। होम मिनिस्ट्री का कहना है कि उनका नाम तय करने से पहले उनके परिवार से मंजूरी ली गई थी। उनकी पत्नी मीरा भट्टाचार्य को सरकार के इस फैसले के बारे में बताया गया था। मंत्रालय ने कहा कि उनके परिवार के किसी भी सदस्य ने यह नहीं बताया था कि वह पद्म भूषण सम्मान नहीं लेना चाहते। जैसी की जानकारी मिल रही है बुद्धदेव भट्टाचार्य के परिवार का कहना है कि उन्हें सम्मान दिए जाने की जानकारी देने वाली कॉल आई थी। परिवार ने कहा कि कॉलर ने यह तो बताया कि बुद्धदेव भट्टाचार्य को पद्म भूषण सम्मान दिया जा रहा है, लेकिन परिवार की हामी के बिना ही कॉल तुरंत काट दिया गया। होम मिनिस्ट्री के सूत्रों ने कहा कि किसी भी हस्ती को पद्म सम्मान दिए जाने से पहले उससे या उसके परिवार से संपर्क किया जाता है और सरकार के फैसले के बारे में जानकारी दी जा सकती है। उधर विवाद खड़ा करने के बाद अब कम्युनिस्ट पार्टी का एक और नया बयान सामने आया है कम्युनिस्ट पार्टी का कहना है कि हमारा दल पहले से ही सरकारी पुरस्कारों को लेकर यह रवैया रखता रहा है। कॉमरेड ईएमएस नंबूदरीपाद भी अवॉर्ड ठुकरा चुके हैं। यह सही है कि कम्युनिस्ट पार्टी राष्ट्रीय सरोकार से जुड़े विषयों को भी राजनीतिक मुद्दे बनाती रही है। लेकिन फिलहाल तो बुद्धदेव भट्टाचार्य के विषय में उनका यह झूठ उजागर हो गया है कि सरकार ने पुरस्कार देने से पूर्व उनसे संपर्क नहीं साधा परिवार ने खुद यह कह दिया है कि फोन पर यह जानकारी दी गई थी, यदि इसपर असहमति होती तो तुरंत ही या फिर पुनः फोन करके मना किया जा सकता था साफ है पहले मना नहीं करने के पीछे ठीक 26 जनवरी के पवित्र राष्ट्रीय दिवस पर विवाद खड़ा करने की षड्यंत्रकारी मानसिकता ही प्रमुख कारण है और इसकी जितनी निंदा की जाए कम है।