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सिनेमा ऐसा माध्यम जिसमें सर्व कलाओं का समावेश

 

उद्भव ग्वालियर अंतरराष्ट्रीय साहित्य उत्सव का तीसरा दिन,सिनेमा,रंगमंच और साहित्य के अंतर्संबंधों पर हुई खास चर्चा

ग्वालियर । उद्भव सांस्कृतिक एवं क्रीड़ा संस्थान, अखिल भारतीय साहित्य परिषद एवं सेंट्रल अकेडमी स्कूल के तत्वावधान में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑॅॅफ टूरिज्म एंड ट्रेवल मैनेजमेंट (आईआईटीटीएम) संस्थान में आयोजित किए जा रहे चार दिवसीय अंतरराष्ट्रीय साहित्य उत्सव के तीसरे दिन दो सत्र हुए। प्रथम सत्र में रंगमंच, चित्रपट और साहित्य के अंतर्संबंध एवं दूसरे सत्र में लोक साहित्य यात्रा, साहित्य और समाज विषय पर विमर्श हुआं। जहां देश के जाने-माने फिल्मकार, गीतकार पियूष मिश्रा, साहित्यकार डॉ’. नंद किशोर पाण्डेय एवं पद्मश्री डॉ. विद्या बिंदु सिंह सहित अनेक विद्वानों ने महत्वपूर्ण पहलुओं पर प्रकाश डाला। साथ ही अतीत की यादों से लेकर वर्तमान की स्थिति और भविष्य की संभावनाओं को टटोला। दोनों सत्रों में जो विचार उभर कर सामने आए वह समाज और साहित्य के साथ ही सिनेमा के लिए कई मायने रखने वाले हैं। सत्र संचालन बृज किशोर दीक्षित एवं प्रो. वंदना कुशवाह ने किया।
प्रथम सत्रः रंगमंच, चित्रपट और साहित्य

नाटक, सिनेमा और साहित्य तीनों अलग-अलग विद्या हैं मुझे यह कहते हुए कोई परहेज नहीं है कि इन तीनों का आपस में कोई अंतर्संबंध है। तीनों को अलग-अलग ही रखा जाना चाहिए। हमें यह स्वीकार करना होगा कि हम नाटक लिखना तो चाहते हैं लेकिन इसके लेखन के लिए गंभीर कोंशिश नहीं करते हैं। यह बात सत्य है कि सिनेमा में साहित्य सदैव दिखता है लेकिन अब फिल्म उद्योग पैसों से चलता है। सिर्फ और सिर्फ पैसा बोलता है भूखे पेट अब इंकलाब नहीं किया जा सकता। साहित्य अभी पुरातन संस्कृति पर चल रहा है जबकि सिनेमा समय के साथ वास्तविक घटनाओं पर आधारित हो गया है ऐसी स्थिति में साहित्य और सिनेमा की पटकथा में जमीन-आसमान का अंतर देखने को मिलता है।
पियूष मिश्रा, गीतकार, फिल्मकार, अभिनेता
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़ सिनेमा और नाटक सदैव साहित्य के साथ चले। लेखकों ने चित्रपटों के अनुरूप पटकथाएं लिखीं। सिनेमा के प्रयोजन में व्यावसायिकता का प्रभाव हो गया है। इसके चलते जो साहित्य का भाव भावनाओं को व्यक्त करता था लेंकिन व्यावसायिकता के कारण आज उपन्यास या पटकथा की मूल कहानी की आत्मा को मारा जा रहा है। बावजूद इसके सिनेमा में साहित्य या अभिव्यक्ति का समावेश किया जा रहा है। आसपास की भौगोलिक एवं सामाजिक स्थिति को प्रतिबिंबित किया जा रहा है। लेकिन सवाल उठता है कि साहित्य का दामन सिनेमा ने क्यों छोड़ा? तो जबाव मिलता है कि सिनेमा का साहित्य अब नये रूप में गढ़ा जा रहा है, जो हम जीवन जीते हैं या जी रहे हैं उसे प्रस्तुत किया जा रहा है।
अभिराम भडमकर, फिल्मकार
फिल्म जगत समाज का एक बिंब दिखाता है- जिसमें एक माँ है और उसके दो पु़त्र हैं। एक के पास धन-दौलत और शोहरत है, दूसरे के पास सिद्धांत हैं लेकिन उसके पास माँ है। फिल्म जगत एक ऐसा माध्यम है, जिसमें सर्वकलाओं का समावेश होता है। यही रंगमंच में होता है बावजूद इसके रंगमंच फिल्म उद्योग से पीछे रह जाता है। कारण उद्योग में पूंजी का निवेश होता है। पूंजी निवेश करने वाला अपनी मनमर्जी के मुताबिक सिनेमा का निर्माण कराता है। एक विरला निर्देशक इन सबके बावजूद कला के संरक्षण को महत्व देता है और सिनेमा व रंगमंच के अंतर्संबंधों को कायम रखता है।
डॉ. इंदुशेखर तत्पुरुष

नाटक सदैव समाज को सकारात्मक संदेश देता है। इसके जरिए हम विभिन्न विषयों पर संदेश देकर लोगों को जागरूक करते हैं। रंगमंच, नाटक लेखन में एक तीखापन होना आवश्यक है। कचरा राक्षस नाटक की पटकथा समाज को स्वच्छता के प्रति संदेश देने में कामयाब रही। जो बड़ों को बताती है कि हमें क्या करना है? अपने भविष्य को कैसे सुरक्षित रखना है तो बच्चों को प्रेरणात्मक सीख देती है। लोगों की गॉंधी की अवरधारणा के मूल को समझाती है। ऐसे में जरूरी हो जाता है कि रंगमंच के लिए वक्त के हिसाब से नई कथा का सृजन हो।
डॉ. आलोक शर्मा, डायरेक्टर आईआईटीटीएम

हिंदी के साहित्य की पूरी दुनिया में धूम है। लेकिन इतने बड़े-बड़े लेखक फिल्म उद्योग में सफल क्यों नहीं हैं? इसमें अनेक तरह के मत हैं। अधिकांश साहित्यकारों का मानना है कि साहित्य को छपना चाहिए। कुछ इसे दोयम दर्जे का मानते हैं। जबकि सिनेमा दृश्य माध्यम की तकनीक है। वह आम साहित्यकार नहीं कर सकता। पहले सिनेमा की तकनीक को समझना आवश्यक है। क्योंकि फिल्म के लिए लिखना एक साधना है, इसमें पटकथा लेखक 10‘-10 घंटे समर्पण भाव से मेहनत करते हैं। सामान्य साहित्यकार के बूते की बात नहीं है।
प्रो. टी.कट्टीमनी

साहित्य सिनेमा को समृद्ध बनाता चल रहा था लेकिन अब वह कमजोर हो गया है। फिल्मकार आज के मापदंड तय कर रहे हैं जो कि अगली पीढ़ी के लिए हैं। फिल्म सिर्फ मनोरंजन का साधन मात्र नहीं वह समाज को दिशा देने वाला माध्यम भी है लेकिन दुर्भाग्य है कि आज दिशाहीन फिल्मों का निर्माण हो रहा है। जबकि सिनेमा का उद्देश्य स्पष्ट होना चाहिए। व्यावसायिक रूप से सिनेमा में लगने वाले पैसे का माध्यम क्या है? यदि कोई पैसा लगा रहा है और उसका जुड़ाव भारतीय संस्कृति और संभ्यता से नहीं है तो फिर वह फिल्म समाज हित वाली नहीं हो सकती है। उसका समाज पर दुष्परिणाम ही सामने आएगा। ऐसे में जरूरी हो जाता है कि पैसा कौन लगा रहा है वह तय हो ताकि भारतीय सिनेमा की आत्मा को बचाया जा सके।
डॉ. नुसरत मेहंदी,

द्वितीय सत्र : लोक साहित्य यात्रा, साहित्य और समाज

वही साहित्य स्वीकार और दीर्घजीवी होता है, जो लोकजीवन के निकट होता है। जो साहित्य लोकमन को समझकर, समाज के साथ जीकर और उसे अपने में समाहित करके लिखा जाता है, उसे ही समाज का दर्पण कहा जाता है।
डॉ. दिनेश प्रताप सिंह, मुंबई

भारत का लोक साहित्य लोक मंगल की कामना से लिखा गया है और उसी भाव से समाज में संप्रेषित किया गया है। भारत को जानने-समझने के लिए भाषाओं की पद्धति की उत्तरोतर प्र्रगति हुई। साहित्य को देखकर, पढ़कर, समझकर एक श्रेष्ठ और विद्वान समाज का निर्माण होता है।
डॉ. पवनपुत्र बादल, लखनऊ

लोक साहित्य लोक यात्रा इनमें से जो विचार तत्व और मूल्य आते हैं उसी पर भारतीय समाज का अस्तित्व बना है। हमारे समाज की उद्देशिका में इन तत्वों का और मूल्यों का दर्शन हम पाते हैं। स्वन्त्रता, समानता, बंधुता और न्याय इन मूल्यों पर हमारा संविधान खड़ा है। इन मूल्यों की जड़ हमारे लोक साहित्य और यात्रा यात्रा साहित्य में पाई जाती है।
रमेश पतंगे, मुम्बई

उत्सव में मंगलवार को

ग्वालियर अंतरराष्ट्रीय साहित्य उत्सव का समापन एवं पुरस्कार वितरण समारोह 30 अगस्त मंगलवार को दोपहर 2 बजे आयोजित किया जाएगा। समारोह के मुख्य अतिथि राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग के अध्यक्ष न्यायमूर्ति अरुण कुमार मिश्रा होंगे। इससे पूर्व दोपहर 12 बजे से 2 बजे तक अंतरराष्ट्रीय विषय पर सत्र होगा।

 

 

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