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स्वाधीनता संग्राम का सही रूप समाज में पहुंचे इसकी जिम्मेदारी हम सभी की

वक्ता कार्यशाला में प्रज्ञा प्रवाह के राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य डॉ सदानंद सप्रे ने किया मार्गदर्शन

ग्वालियर /स्वाधीनता के अमृत महोत्सव के अंतर्गत आज ग्वालियर में शरद चन्द्र मेहरोत्रा स्मृति न्यास द्वारा  वक्ता कार्यशाला का आयोजन राष्ट्रोत्थान न्यास  विवेकानंद सभागर में किया गया। कार्यशाला में मुख्यवक्ता के रूप में प्रज्ञा प्रवाह के राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य डॉ सदानंद सप्रे उपस्थित थे। कार्यक्रम में उपस्थित वक्तागणों का मार्गदर्शन करते हुए  उन्होंने कहा कि हमारे स्वतंत्रता संग्राम का कालखंड बहुत बड़ा है और इसको लेकर तमाम विसंगतियां भी व्याप्त हैं। इस स्वाधीनता संग्राम का सही रूप समाज में पहुंचे इसकी जिम्मदारी हम सभी वक्तागणों की है। उन्होंने कहा कि धारणाओं और विसंगतियों में बदल होना चाहिए इस दृष्टि से हम सभी को तैयारी करना चाहिए। डॉ सप्रे ने कुछ महत्वपूर्ण बिंदुओं की ओर  ध्यानाकर्षित करते हुए कहा कि समाज में ऐसी धारणा व्याप्त है कि हमारा स्वतंत्रता संग्राम 1857 से प्रारंभ हुआ यह गलत है। उन्होंने कहा कि स्वातन्त्र्य वीर सावरकर ने स्वतंत्रता संग्राम का जो इतिहास लिखा उसे गलत बताने की कोशिश की गई। यह भी कहना गलत है कि यह संग्राम कोई  विद्रोह था या फिर देश के कुछ एक हिस्से तक ही सीमित था। इसको लेकर यह भी झूठ फैलाया गया  कि  यह अहिंसक था । डॉ सप्रे ने अपने मार्गदर्शन में कहा कि हमें तमाम तथ्यों और स्थानीय प्रमाणों के सम्मिलन के साथ समाज को यह उल्लेखित करना है कि भारत का स्वाधीनता संग्राम में सम्पूर्ण देश की सहभागिता थी इसकी शुरुआत तो 1857 से पहले ही हो चुकी थी। उन्होंने बताया की 15 अगस्त 1947 की स्वतंत्रता केवल अंग्रेजों से मिली थी इससे पूर्व भी यह एक हजार वर्ष का सँघर्ष था। और यह केवल अहिंसक नहीं अपितु यह आजादी का सशस्त्र प्रयास था । जिसमें अनेक लोगों द्वारा सशस्त्र क्रांति करके देश को स्वतंत्र कराने में अपना योगदान दिया था।

डॉ सप्रे ने कहा कि वक्तागणों को अपने सम्बोधन में विविध शब्दों के उपयोग ,श्रोताओं की बौद्धिक श्रेणी ,समय सीमा आदि का भी  विशेष ध्यान रखने की जरूरत है। उन्होंने उदाहरण स्वरूप आदिवासी की जगह जनजातीय आजादी के स्थान पर स्वाधीनता शब्दों के उपयोग पर बल देते हुए कहा कि समाज में जब सही शब्द बार बार कानों में पहुंचते हैं तो उनके उपयोग का वातावरण निर्मित होता है ।

सदानंद जी सप्रे ने स्वाधीनता संग्राम को कालखण्ड में विभक्त करके अपना सम्बोधन देने की बात कही। इसके अनुसार प्लासी के युद्ध से 1857 का कालखण्ड, 1857 से 1885 अर्थात कांग्रेस की स्थापना के समय तक का कालखण्ड ओर कांग्रेस की स्थापना के पश्चात का कालखण्ड में विभाजित किया जा सकता है।

डॉ सप्रे ने अपने मार्गदर्शन में कहा कि स्वाधीनता के अमृत महोत्सव के अंतर्गत विविध श्रेणियों के बीच अनेक प्रकार के कार्यक्रम आयोजित किये जा सकते हैं।इस तरह के आयोजनों में महिला शक्ति की महत्वपूर्ण भूमिका को भी इंगित करते हुए उन्हें भी इसके साथ प्रथमिकता से जोड़ने की बात कही ।

इससे पूर्व डॉ सदानंद सप्रे के साथ शरद मेहरोत्रा सेवा न्यास के अध्यक्ष रामभरोसे तोमर व ग्वालियर विभाग संघचालक विजय गुप्ता ने भारत माता के चित्र पर दीप प्रज्ज्वलित करके कार्यशाला का शुभारंभ किया  कार्यक्रम की प्रस्तावना राजकिशोर वाजपेयी ने प्रस्तुत की संचालन प्रोफेसर रामकिशोर उपाध्याय व आभार बृजमोहन श्रीवास्तव ने व्यक्त किया।

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