प्रवीणपप्रवीण दुबे
रणछोड़दास डीन
जब मर्ज लाइलाज हो जाए तो डॉक्टर भी मैदान छोड़ने मजबूर हो जाते हैं। कुछ ऐसी ही लाइलाज बीमारी ने ज़ी आर मेडीकल कॉलेज और उससे सम्बंधित बड़े अस्पताल को जकड़ लिया है परिणाम यह है की बड़े डाक्टरबाबू रणछोड़दास डीन बन मैदान छोड़ गए हैं। उन्होंने मैदान क्या छोड़ा हड्डी वालों की उचट कर लग गई पांचों उंगलियां घी में और सर कढ़ाई में लिंक रोड के आलीशान अस्पताल के मालिक और डीन की कुर्सी हो गई उनकी बल्ले बल्ले सुना है की अब अस्पताल के धाकड़ डॉक्टर के चारणभाट की भूमिका में असली डीन का विकेट उड़ाकर परमानेंट कुर्सी हथियाने की सकुनी चालें चली जा रही हैं। हमारा तो असली डीन साहब को यही सुझाव है रणछोड़दास की भूमिका छोड़ उतर जाओ मैदान में नहीं तो फिर पछताना पड़ेगा।
हाइपरटेंशन में उर्जाधिराज
सुना है अपने ऊर्जा मंत्री बेहद टेंशन में हैं।पहला टेंशन अपनी फायर ब्रांड बुआजी ने दिया तो दूसरा टेंशन योजना को अस्वीकार करके मामा जी ने ,तनाव इस कदर सर चढ़कर बोल रहा है की बेचारे दुर्घटना का शिकार हो गए। भला हो भगवान का की कोई गम्भीर चोट नहीं लगी नहीं तो टेंशन और बढ़ जाती। उन्हें समझ नहीं आ रहा करें तो क्या करें ? पँजादल में जिस कार्यशैली पर नम्बर बढ़ते थे वाहवाही होती थी कमलदल में तो आंखे तरेरी जा रही हैं नसैनी पर चढो तो आफत दीवाल पर लात मारो तो परेशानी, टॉयलेट साफ करो तो दिक्कत और तो और नाचने गाने पर भी आपत्ति ! जाएं तो जाएं कहां।
नोकरशाही की मजबूरी
बेचारी नोकरशाही इनकी तरफ जाए या उनकी तरफ एक तरफ तबादला होने का डर सता रहा है तो दूसरी तरफ प्रभारी मंत्री के लिए मुख्यमंत्री की मुनादी तबादले में तो उन्हीं की चलेगी मतलब साफ 15 साल की जुगाड़ नहीं चलने वाली अब तो एक ही रास्ता है जो महल होकर ही जाता है। तबादला रुकवाना है तो अब सत्ता से लेकर संगठन तक बहुत बड़ी है महाराज की टीम चुनना आपको है तो पकड़ लीजिए किसी एक का हाथ और शुरू हो जाइए पंजा छाप स्टायल में जी हुजूरी करने के लिए नहीं तो बांध लीजिए अपना बोरिया बिस्तर कोई बचाने वाला नहीं।
छुट्टी से सूपड़ा साफ
बड़े साहब छुट्टी पर क्या गए हो गई सबकी बल्ले बल्ले जहां भी देखो वहीं सन्नाटा है कहीं कुछ हलचल दिखाई भी देती है तो थकान उतारते गप्पे लड़ाते सरकारी बाबू बड़े साहब की छुट्टी का जहां कामकाज पर असर दिखाई दिया वहीं कामकाज सम्भालने वाले अपने मुंसीपल्टी वाले साहब की तो जैसे पोल ही खुल गई कोरोना भगाने जहां बड़े साहब के नेतृत्व में रिकॉर्ड बना वहीं उनकी अब लाख कोशिशों के बावजूद लक्ष्य से आधे पर ही अभियान की हवा निकल गई
मेडम की गलत फहमी
पेट्रोल क्या महंगा हुआ अपनी स्मार्ट सिटी वाली मैडम साहिबा की तो जैसे उचट कर लग गई शहर के चौराहे चौराहे खड़ी धूल खा रही साइकिलों के तो जैसे पंख लग गए हैं। मेडम साहिबा भी श्रेय लेने पीछे नहीं हैं जोर शोर से सफलता के श्रेय की मुनादी पिटवाई जा रही है बताया जा रहा है उनके प्रयासों से जून में साइकिल चलाने वालों की संख्या 12 सौ के पार पहुंच गई है। भला मैडम को कौन समझाए यह सफलता नहीं जनता की मजबूरी है हम तो यही कहेंगे मैडम साहिबा प्रार्थना कीजिए पेट्रोल के दाम ऐसे ही बढ़ते रहें और जैसे जैसे यह बढ़ेंगे वैसे वैसे आपकी पब्लिक बाइक स्कीम भी सफलता के सौपान चढ़ेगी और आपको मौका मिलेगा माइक लेकर चिल्लाने का, भाई क्या आइडिया है।




