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कहीं न्यायाधीश दीपक मिश्रा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाना कांग्रेस के लिए आत्मघाती साबित न हो जाये… खुद कांग्रेस में उठे विरोध के स्वर

कहीं न्यायाधीश दीपक मिश्रा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाना खुद #Congres पार्टी के लिए आत्मघाती साबित न हो जाये... खुद कांग्रेस में उठे विरोध के सुर

कांग्रेस पार्टी ने 6 विपक्षी दलों के सहयोग से सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के खिलाफ महिभियोग प्रस्ताव लाने का फैसला किया है तथा इसके लिए लिए उसने 64 वर्तमान तथा 7 पूर्व सांसदों के हस्ताक्षर करके उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू को नोटिस दे दिया है. लेकिन जस्टिस लोया की मौत की SIT जाँच की मांग की याचिका को ख़ारिज किये जाने के अगले दिन ही कांग्रेस का ये प्रस्ताव लाना अपने आप में सवाल खड़े करता है वहीं खुद कांग्रेस पार्टी के अंदर ही इसको सवाल उठने लगे हैं.

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता तथा पूर्व केन्द्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद ने कहा है कि उनसे इस मामले में कोई राय नहीं ली गयी है तथा वह इस फैसले को सही नहीं मानते हैं. उन्होंने कहा कि चाहे जज लोया का मामला हो या कोई अन्य, सुप्रीम कोर्ट का फैसला ही अंतिम होता है. अगर शीर्ष कोर्ट के फैसले को लेकर किसी को कोई आपत्ति है तो पुनर्विचार याचिका, उपचारात्मक याचिका दाखिल करने की छूट होती है. यह अलग बात है कि इनका दायरा बहुत सीमित होता है लेकिन इसका मतलब ये नहीं बनता कि इस तरह के कृत्य किये जाएँ. पेशे से वकील कांग्रेस नेता सलमान खुर्शीद ने कपिल सिब्बल पर निशाना साधते हुए कहा कि वकील का काला गाउन और सफेद बैंड पहनने वाले किसी भी आदमी के लिए कोर्ट के फैसले पर सोच समझ कर सवाल उठाने चाहिए. यह संवेदनशील मामला है. उन्होंने कहा कि शीर्ष कोर्ट के फैसले पर राजनीति करने को उचित नहीं कहा जा सकता है.

सलमान खुर्शीद की तरफ से उठाए गए सवाल से कांग्रेस के इस कदम की हवा निकल रही है. कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व कानून मंत्री की तरफ से ही जब इस मामले का खुलकर समर्थन नहीं किया जा रहा है तो फिर कांग्रेस की ये कोशिश उनकी राजनीति की ही एक कड़ी मानी जानी चाहिए. सवाल उठता है कि क्या अपने मनमुताबिक फैसले नहीं होने पर न्यायपालिका की गरिमा पर सवाल खड़ा किया जा सकता है? क्या दीपक मिश्रा के खिलाफ उस पद की गरिमा को कम करने का आरोप साबित हुआ है?क्या किसी तरह के गलत व्यवहार का आरोप साबित हो गया है? अगर ऐसा नहीं है तो महज आरोप लगाकर राजनीतिक फायदे के लिए महाभियोग लाने की कांग्रेस की इस प्रक्रिया को कहां तक जायज ठहराया जा सकता है?

सबसे बड़ी बात ये है कि कांग्रेस का का ये प्रस्ताव सफल होना भी असंभव है क्योंकि इसके लिए संसद में दो-तिहाई सदस्यों के समर्थन की आवश्यकता होती है जो कांग्रेस तथा उसके साथियों के पास नहीं है. यहाँ भी सवाल खड़ा होता है कि जब कांग्रेस विपक्षी दलों के साथ मिलकर भी महाभियोग प्रस्ताव पास नहीं करा सकती है तो फिर इस मुद्दे को इतनी हवा क्यों दे रही है. दरअसल, यह सबकुछ राजनीतिक फायदे के लिए किया जा रहा है. कांग्रेस मोदी सरकार पर संवैधानिक संस्थाओं के दुरुपयोग करने का आरोप पहले से लगाती रही है. लेकिन, सोहराबुद्दीन इनकाउंटर की जांच कर रहे जज लोया का मामला चूंकि सीधे बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह से जुड़ा हुआ था. लिहाजा इस मामले में आए फैसले पर सवाल खड़ा कर कांग्रेस अपना वोटबैंक साधने की कोशिश कर रही है.

एक और दिलचस्प बात है कि सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की ही बेंच में अयोध्या में मंदिर विवाद की सुनवाई हो रही है. ऐसे में कांग्रेस की जस्टिस दीपक मिश्रा के खिलाफ आक्रामकता भी कई सवाल खड़े कर रही है. कांग्रेस अपनी तरफ से ज्यादा आक्रामक होकर सियासी फायदा लेने की कोशिश कर रही है. लेकिन जिस हडबडाहट में कांग्रेस पार्टी न्यायाधीश दीपक मिश्रा के खिलाफ मुखर हो रही है उससे संभव है कि कांग्रेस का ये फैसला खुद कांग्रेस के लिए आत्मघाती साबित हो हो जाये क्योंकि देश की जनता भी देख रही है कि इस बहाने कांग्रेस न्यायपालिका को डराने की कोशिश कर रही है.

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